allahabad travel places: प्रयागराज, जिसे पहले इलाहाबाद के नाम से जाना जाता था, उत्तर प्रदेश का एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर से भरपूर शहर है। यहाँ की गलियाँ, घाट, किले और मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय इतिहास और संस्कृति के भी जीवित उदाहरण हैं।
हिन्दू मान्यता से यह पता चलता है की सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि कार्य पूर्ण होने के बाद सबसे प्रथम यहां यज्ञ किया था। इसी प्रथम यज्ञ के प्र और याग अर्थात यज्ञ की संधि द्वारा प्रयाग का नाम पड़ा |
हिंदी भाषा में प्रयाग का नाम ‘नदियों का संगम’ भी है | यही पे गंगा यमुना और सरस्वती नदियों का संगम भी है | अक्सर ‘पांच प्रयागो का राजा’ कहा जाने के कारण इसे प्रयाग राज भी कहा जाता है |
प्रयागराज उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित है। प्रयागराज में हर 12 वर्षों में विश्व प्रसिद्ध कुंभ मेला लगता है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं। अर्धकुंभ मेला हर 6 वर्षों में होता है। यहाँ पातालपुरी मंदिर, हनुमान मंदिर, और भारद्वाज आश्रम जैसे कई धार्मिक स्थल हैं।
मुगल और ब्रिटिश काल दोनों में यह शहर एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र रहा है। इलाहाबाद किला अकबर द्वारा बनवाया गया था और आज भी यहाँ इतिहास की झलक मिलती है। आनंद भवन, नेहरू परिवार का आवास रहा है, जो अब एक संग्रहालय है।
प्रयागराज को शिक्षा नगरी भी कहा जाता है। यहाँ का इलाहाबाद विश्वविद्यालय देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। यह शहर IAS और PCS की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए भी जाना जाता है। प्रयागराज आज भी अपने ऐतिहासिक और धार्मिक स्वरूप के साथ-साथ तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रहा शहर है। यहाँ सड़क, रेल और हवाई सेवाओं की अच्छी सुविधा है। नए पुल, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं, और बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर इसे उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों में शामिल करते हैं। प्रयागराज की पहचान त्रिवेणी संगम का शहर, कुंभ और आध्यात्मिकता का केंद्र, स्वतंत्रता संग्राम की धरोहर, और शिक्षा और संस्कृति का संगम है |
इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे प्रयागराज के 10 सबसे बेहतरीन पर्यटन स्थलों के बारे में, जो न केवल आपके दिल को छू लेंगे, बल्कि आपके यात्रा अनुभव को भी अविस्मरणीय बना देंगे।
1. त्रिवेणी संगम – आत्मिक शांति का अनुभव(allahabad travel places)

तीन पवित्र नदियों का मिलन स्थल ‘त्रिवेणी संगम’ प्रयागराज के बीचों बीच एक सुरम्य तीर्थस्थल है | इस जगह का बेहद खास धार्मिक महत्व है | यहां गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती नदी का संगम होता है | संगम की रेती पर लगने वाले कुंभ मेले के दौरान तो यहां भक्ति और आस्था का सैलाब ही उमड़ पड़ता है | बड़ी संख्या में श्रद्धालु जीवन और मोक्ष की तलाश में इस पौराणिक स्थल की यात्रा करते हैं |
त्रिवेणी संगम, प्रयागराज (इलाहाबाद) में बसा एक अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक स्थल है जहाँ तीन नदियाँ – गंगा, यमुना, और सरस्वती – एक साथ मिलती हैं। यह स्थान भारत के सबसे धार्मिक स्थलों में से एक माना जाता है और यहां पर लाखों श्रद्धालु हर वर्ष दर्शन और स्नान के लिए आते हैं। यह प्रयागराज (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश में बसा है |
यह संगम शहर के दक्षिणी छोर पर स्थित है, जहाँ गंगा और यमुना नदियाँ दृश्य रूप में मिलती हैं और सरस्वती नदी अदृश्य रूप में सम्मिलित मानी जाती है। गंगा नदी: पवित्रतम मानी जाने वाली नदी, हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी तक जाती है। यमुना नदी: यमुनोत्री से निकलने वाली, शांत और गहरे नीले रंग की नदी। सरस्वती नदी: अदृश्य नदी मानी जाती है जो केवल धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है, परंतु मान्यता है कि यह भी संगम में मिलती है।
सरस्वती नदी: अदृश्य नदी मानी जाती है जो केवल धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है, परंतु मान्यता है कि यह भी संगम में मिलती है। महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में संगम का उल्लेख मिलता है |
तीन पवित्र नदियों – गंगा, यमुना और सरस्वती – के संगम पर स्थित यह जगह आध्यात्मिक और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत संगम है। यहाँ एक डुबकी लगाना पुण्य माना जाता है, खासकर कुंभ मेले के समय।
यहाँ स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और लाखों श्रद्धालु यहाँ आकर आस्था की डुबकी लगाते हैं। कुम्भ मेला, अर्धकुम्भ मेला और माघ मेला जैसे धार्मिक मेले इसी संगम पर आयोजित होते हैं।
पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए यह स्थल सर्वोत्तम माना गया है। प्रयागराज को प्राचीन काल में ‘प्रयाग’ कहा जाता था, जिसका अर्थ होता है ‘यज्ञों की भूमि’।
- त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से पापों का क्षय और आत्मा की शुद्धि मानी जाती है; इससे भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर कायाकल्प संभव है |
- यह स्थान केवल भौगोलिक संगम नहीं, बल्कि विश्वास और प्रकृति का मिलन है। यहां आकर लोग ध्यान, जप, पूजा से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करते हैं |
- महाकुंभ और अन्य धार्मिक मेलों में लाखों लोग स्नान, पूजा और दान के लिए संगम आते हैं – इन अवसरों पर यहां का वातावरण विलक्षण ऊर्जा, दिव्य मंत्रोच्चार और सामूहिक आस्था से परिपूर्ण होता है |
- गंगा (पवित्रता), यमुना (भक्ति) और सरस्वती (ज्ञान) का मिलन – यह संगम स्वयं शरीर, मन और आत्मा की एकता और संतुलन का प्रतीक है |
- वैज्ञानिक दृष्टि से, संगम के जल में प्राकृतिक रूप से शुद्धिकरण की अद्भुत क्षमता है, जिससे मानसिक शांति और ऊर्जा मिलती है |
- संगम क्षेत्र को अक्षय क्षेत्र कहा गया है, यानी यहाँ किए गए धर्म-कर्म का पुण्य अक्षय रहता है |
- लोग यहाँ अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए भी भस्म/अस्थि प्रवाह और पितृ शांति महापूजा करते हैं |
- वर्षों से यह परंपरा चली आ रही है कि यहाँ स्नान, ध्यान और दान से व्यक्ति का जीवन रूपांतरित हो सकता है और वह समाज में सकारात्मकता फैलाता है |
भोजन :
यहाँ पर संगम मार्ग के स्ट्रीट फूड स्टॉल्स पर कचौड़ी-जलेबी, लोकल चाट भंडार पर आलू टिकिया, रामबाग और संगम के पास ठंडई और लोकल ढाबों और रेस्टोरेंट्स में शुद्ध शाकाहारी थाली मिल जाती है |
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कैसे पहुंचें?
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेल मार्ग | प्रयागराज जंक्शन स्टेशन से 7-8 किमी |
| हवाई मार्ग | प्रयागराज एयरपोर्ट से 15 किमी |
| सड़क मार्ग | किसी भी शहर से बस/टैक्सी द्वारा सीधी पहुँच |
2. इलाहाबाद किला (Allahabad Fort) – इतिहास और रहस्य से भरा एक मुगलकालीन धरोहर

allahabad travel places: मुगल सम्राट अकबर द्वारा 1583 में निर्मित यह किला यमुना नदी के किनारे स्थित है। यह किला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में वर्गीकृत है।
इलाहाबाद किला, प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) का सबसे प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है। यह किला गंगा और यमुना नदियों के संगम के पास स्थित है और मुगल काल की उत्कृष्ट वास्तुकला का प्रतीक है। यह न केवल स्थापत्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी गहरा है। यह त्रिवेणी संगम के पास, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में है | गंगा नदी के तट पर है |
किले में विशाल प्रांगण, संगमरमर की नक्काशी, और लाल बलुआ पत्थर से बनी संरचनाएँ देखने लायक हैं। इसमें तीन विशाल द्वार (गेट) हैं, और किले के चारों ओर मजबूत परकोटा (दीवार) है।
किले के भीतर अशोक स्तंभ और अकबर के समय की वास्तुकला पर्यटकों को आकर्षित करती है। इसे“इलाहाबाद (अर्थ: ईश्वर का घर) नाम दिया गया, जो बाद में ‘इलाहाबाद’ और फिर ‘प्रयागराज’ बन गया।
इसमें विशाल द्वार, बुर्ज़ (watch towers), प्राचीर, और गुप्त सुरंगें हैं। किला मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है।
- अकबर द्वारा बनाए गए सभी किलों में इलाहाबाद का किला सबसे बड़ा किला है, जो प्राचीन मुगलकालीन की अद्भुत शैली को दर्शाता है।
- किले के मुख्य द्वार के अंदर एक अशोक स्तंभ हैं जो भारतीय इतिहास के प्राचीन बौद्ध काल में प्रयोग महत्ता का प्रमाण है।
- किले के मुख्य द्वार के अंदर एक अशोक स्तंभ हैं जो भारतीय इतिहास के प्राचीन बौद्ध काल में प्रयोग महत्ता का प्रमाण है।
- यह किला 1775 ई. में अंग्रेजों द्वारा बंगाल के शासक शुजाउद्दौला को केवल 50 लाख रुपए में बेच दिया गया था। परंतु 1798 ई. में शाजत अली से अंग्रेज़ो की संधि हुई और किला दौबरा अंग्रेज़ो के हाथ में आ गया।
- इस किले में तीन बड़ी गैलरी हैं जहां पर ऊंची मीनारें हैं, जो किले की सुंदरता को बढ़ाती है।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप यह किला संरक्षित है। परंतु वर्तमान में पर्यटकों के लिए इसके कुछ भाग ही केवल खुले हैं बाकी बचे हुए भाग का प्रयोग भारतीय सेना करती है।
- इसे किले में पर्यटकों को अशोक स्तंभ, सरस्वती कूप और जोधाबाई महल देखने की अनुमति है। इसके अतिरिक्त किले में एक अक्षय वट मशहूर बरगद का पुराना पेड़ और पातालपुर मंदिर नाम से विख्यात एक मंदिर है।
- पार्क में पत्थर से बना 10.6 मीटर का विशाल अशोक स्तंभ है, इसके बारे में लोगों का कहना है कि इसका निर्माण 232 ईसा पूर्व किया गया था। विशेषकर पुरातात्विक विशेषज्ञ और इतिहासकारों के लिए यह स्तंभ महत्व रखता है।
- बताया जाता है कि 644 ईसा पूर्व में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। तब कामकूप तालाब मैं इंसानी नरकंकाल देखकर दुखी हो गया था। उसने अपनी किताब में भी इसका जिक्र किया था। उसके जाने के बाद ही मुगल सम्राट अकबर ने यहां किला बनवाया।
- इस किले में स्थापत्य कला के साथ ही अपने गर्भ में जहांगीर, अक्षयवट, अशोक स्तंभ व अंग्रेजों की गतिविधियों की तमाम अबूझ कहानियों को भी समेटे हुए है।
- ये किला अपनी विशिष्ट बनावट, निर्माण और शिल्पकारिता के लिए जाना जाता है। नक्काशीदार पत्थरों की विशायलकाय दीवार से यमुना की लहरें टकराती है। इसके अंदर पातालपुरी में कुल 44 देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं, जहां लोग आज भी पूजा पाठ करते हैं।
भोजन :
यहाँ का व्यंजन सिविल लाइंस, किले के बाहर लोकल स्टॉल्स पर छोले भटूरे, संगम मार्ग पर ठंडई और कचौड़ी और पुराने शहर के मिष्ठान्न भंडारों में मिष्ठान्न (गुलाब जामुन, रसगुल्ला) मिल जाता है |
कैसे पहुंचें? (allahabad travel places)
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेल मार्ग | प्रयागराज जंक्शन से 6 किमी दूरी पर |
| बस/टैक्सी | शहर के किसी भी कोने से टैक्सी/ऑटो से आसानी से पहुँच |
| हवाई मार्ग | प्रयागराज एयरपोर्ट से 13 किमी दूर |
3. खुसरो बाग (Khusro Bagh), प्रयागराज – मुग़ल वास्तुकला और इतिहास का शांत स्थल (allahabad travel places)

यह बाग मुग़ल सम्राट जहाँगीर के बेटे खुसरो मिर्जा और उनकी माँ शाह बेगम की समाधियों के लिए प्रसिद्ध है। यह स्थल मुग़ल वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ की शांतिपूर्ण वातावरण और ऐतिहासिक महत्व पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
यह एक सुंदर मुगल शैली का बाग और मकबरा परिसर है, जहाँ सम्राट जहांगीर के पुत्र खुसरो मिर्जा और अन्य शाही व्यक्तियों की कब्रें स्थित हैं। यह प्रयागराज रेलवे स्टेशन के पास बसा है | यहाँ का मुख्य आकर्षण मुगल वास्तुकला, ऐतिहासिक महत्व है |
यहां आने वाले लोग इसे एक “हिस्टोरिकल पार्क” के रूप में पसंद करते हैं। यह एक चार बाग शैली (चार दिशाओं में बागीचे) में बना हुआ स्मारक है। बाग के भीतर तीन प्रमुख मकबरे हैं – शाह बेगम, ख़ुसरो मिर्ज़ा और निसा बेगम (ख़ुसरो की बहन) के।
मकबरों पर बारीक नक्काशी, फारसी शिलालेख, गुंबदों, और मेहराबों का सुंदर संयोजन देखने को मिलता है।
- बाग के भीतर बलुए पत्थर से बने तीन प्रमुख मकबरे हैं – खुसरो मिर्जा (जहांगीर के पुत्र), उनकी मां शाह बेगम (जहांगीर की हिंदू पत्नी), और बहन निथार बेगम। इन मकबरों में मुग़ल कला व फारसी डिज़ाइन की झलक मिलती है |
- खुसरो बाग का संबंध न केवल मुग़ल इतिहास से, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से भी है। 1857 के विद्रोह के दौरान यह क्रांतिकारियों का मुख्यालय रहा था |
- यह बाग लगभग 17 बीघे क्षेत्र में फैला है और चारों ओर ऊँची दीवारों से घिरा है। बाग के चारों ओर अत्यंत भव्य द्वार हैं, जिनमें मुख्य द्वार को शाही वास्तुकला की मिसाल माना जाता है |
- एक लोक मान्यता है कि मकबरे के प्रवेश द्वार में घोड़े की नाल इसलिए लगाई जाती है क्योंकि यहाँ के घोड़ों ने अपने मालिकों की जान बचाई थी; लोग आज भी मन चाही मन्नत पूरी होने पर इस तरह की नाल चढ़ाते हैं |
- शाह बेगम का मकबरा हिंदू और इस्लामी वास्तुकला का अनूठा संगम दिखाता है – फतेहपुर सीकरी के पंचमहल से प्रेरित डिजाइन |
- खुसरो बाग उन लोगों के लिए आदर्श स्थल है जो इतिहास, पुरातात्विक वास्तु और आंतरिक शांति की तलाश में हैं; यहाँ प्रकृति और स्थापत्य कला का दुर्लभ मेल मिलता है |
- बाग के भीतर अमरूद के बगीचे और व्यापक पौधशाला हैं, जहाँ से विश्व प्रसिद्ध इलाहाबाद के अमरूद विदेशों तक निर्यात किए जाते हैं |
- सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है एवं इसकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा की जाती है; यहाँ प्रवेश निशुल्क है।
भोजन :
यहाँ पे स्टेशन रोड के स्ट्रीट फूड स्टॉल्स पर समोसा-जलेबी, सिविल लाइंस के पास छोले भटूरे और ‘हरि राम & संस’ जैसे लोकल मिष्ठान्न भंडार पर मिष्ठान्न मिलते हैं |
और पढ़े : खुसरो बाग़ के बारे में पूरी जानकारी
कैसे पहुंचें?(allahabad travel places)
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेलवे | प्रयागराज जंक्शन से पैदल दूरी पर (1-2 मिनट) |
| बस/टैक्सी | शहर के किसी भी कोने से टैक्सी या ऑटो द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है |
| हवाई अड्डा | प्रयागराज एयरपोर्ट से लगभग 13-14 किमी दूर |
4. स्वराज भवन (Swaraj Bhavan), प्रयागराज – स्वतंत्रता संग्राम की जन्मस्थली(allahabad travel places)

स्वराज भवन, जिसे पहले आनंद भवन कहा जाता था, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके परिवार का निवास स्थान था। यहाँ स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित कई ऐतिहासिक वस्तुएं और चित्र प्रदर्शित हैं, जो इतिहास प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।
स्वराज भवन, प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) का एक ऐतिहासिक स्थल है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और नेहरू-गांधी परिवार की विरासत से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह भवन स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मस्थान भी है और एक समय पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र रहा।
1930 के दशक में जब मोतीलाल नेहरू ने आनंद भवन गांधीजी को राजनीतिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया, तब स्वराज भवन को परिवार का निवास बनाया गया और इसका नाम “स्वराज भवन” रखा गया। यह भवन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कई महत्वपूर्ण बैठकों का गवाह रहा है।
1942 इन्दिरा गाँधी का विवाह इसी भवन में हुआ और 1938 मे जवाहरलाल नेहरु की मां स्वरुप रानी की मृयु भी यहीं हुयी। 1970 में इन्दिरा गाँधी ने इस भवन को राष्ट्र को समर्पित कर दिया और इसके बाद इसे एक संग्रहालय का स्वरुप दे दिया गया। इसके खुलने का समय प्रात: 9.30 से सांय 5 बजे तक हैं। साप्ताहिक अवकाश सोमवार को रहता हैं।
- स्वराज भवन पहले ‘महमूद मंजिल’ के नाम से जाना जाता था, जिसे मोतीलाल नेहरू ने 1899-1900 के आसपास खरीदा था। शुरुआत में यह नेहरू परिवार का निवास था, बाद में इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों का केंद्र बनाकर ‘स्वराज भवन’ नाम दिया गया |
- यही वह स्थान है जहाँ पं. जवाहरलाल नेहरू ने बचपन बिताया और उनकी बेटी इंदिरा गांधी का जन्म (19 नवम्बर 1917) भी इसी भवन में हुआ था |
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, यहां के भूमिगत कमरों में गुप्त क्रांतिकारी सभाएँ और मीटिंग्स हुआ करती थीं। महात्मा गांधी, सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू जैसे दिग्गज नेता भी यहाँ आते थे। कांग्रेस के कई अधिवेशन, धर्मसभाएँ और समितियाँ यहीं से संचालित होती थीं |
- 1930 में मोतीलाल नेहरू ने यह भवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। इसके बाद यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का स्थानीय मुख्यालय बन गया। 1931 में पं. जवाहरलाल नेहरू ने ट्रस्ट बनाकर भवन को शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित किया |
- आज स्वराज भवन संग्रहालय के रूप में प्रसिद्ध है – यहाँ नेहरू परिवार व स्वतंत्रता आंदोलन की दुर्लभ तस्वीरें, व्यक्तिगत सामान, गांधीजी का चरखा, बग्घी आदि सुरक्षित हैं। भवन में कुल 42 कमरे हैं और भूमिगत कक्ष आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं |
- स्वराज भवन में एक समय बाल भवन (शिशु शिक्षा व गतिविधियों के लिए केंद्र) भी कार्यरत था, जिसे बाद में पास के भवन में स्थानांतरित कर दिया गया।
- विशाल और आकर्षक मुगल व औपनिवेशिक शैली की यह दो मंजिली हवेली, स्वतंत्रता संग्राम व भारतीय राजनीति की अनेक घटनाओं की साक्षी रही है |
भोजन :
यहाँ का व्यंजन सिविल लाइंस के लोकल रेस्टोरेंट्स पर शुद्ध शाकाहारी थाली, MG रोड और CIC टॉवर के पास समोसे और मिठाइयाँ और आनंद भवन के पास स्ट्रीट स्टॉल्स पर ठंडई और कुल्फी मिलती है |
कैसे पहुंचें?
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेलवे स्टेशन से दूरी | प्रयागराज जंक्शन से 4 किमी |
| एयरपोर्ट से दूरी | प्रयागराज एयरपोर्ट से 12 किमी |
| बस/टैक्सी/ऑटो | शहर में सभी प्रमुख स्थानों से कनेक्टेड |
5. चंद्रशेखर आज़ाद पार्क (Chandra Shekhar Azad Park), प्रयागराज – शौर्य, बलिदान और इतिहास का प्रतीक स्थल (allahabad travel places)
1870 में स्थापित यह पार्क पहले ‘अल्फ्रेड पार्क’ के नाम से जाना जाता था। यहाँ 1931 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद ने अंग्रेजों से लड़ते हुए शहादत प्राप्त की थी। यह पार्क स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को जीवित रखता है और यहाँ का वातावरण शांति प्रदान करता है।
यह पार्क आज़ादी के इतिहास का साक्षी है और प्रयागराज के सबसे सुंदर और बड़े सार्वजनिक उद्यानों में से एक है। 1870 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बनवाया गया, जब प्रिंस अल्फ्रेड भारत यात्रा पर आए थे। इसका पहला नाम “Company Bagh” था, बाद में इसे Alfred Park नाम दिया गया।
27 फरवरी 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद ने यहाँ अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए खुद को गोली मार ली ताकि वे गिरफ्तार न हो सकें। जिस पिस्टल से चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी गोली मारकर हत्या की थी वो आज भी हम लोगो के बीच इलाहाबाद संग्रहालय में मौजूद है |
- यह पार्क सन 1870 में ब्रिटिश राजकुमार अल्फ्रेड की प्रयागराज यात्रा के उपलक्ष्य में 133 एकड़ भूमि पर बनाया गया था, जो प्रयागराज का सबसे बड़ा सार्वजनिक पार्क है |
- 27 फरवरी 1931 को यहीं पर महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था। अंग्रेजों की घेराबंदी और गोलीबारी के दौरान आज़ाद ने अपनी आखिरी गोली स्वयं को मारकर अपनी गिरफ्तारी से इंकार कर दिया था |
- उनकी शहादत की स्मृति में इस पार्क का नाम ‘चंद्रशेखर आज़ाद पार्क’ रखा गया, जो आज़ादी के दीवानों को समर्पित है |
- पार्क के अंदर ही वह स्थान चिन्हित है जहाँ चंद्रशेखर आज़ाद ने बलिदान दिया था; आज भी वहाँ स्मृति चिह्न और उनकी प्रतिमा विराजित है।
- स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह पार्क क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा तथा जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसी हस्तियों के आंदोलनों का भी गवाह रहा।
- पार्क परिसर में इलाहाबाद लोक पुस्तकालय (थॉर्नहिल मेमोरियल), विक्टोरिया मेमोरियल जैसी औपनिवेशिक संरचनाएं एवं वास्तुकला हैं, जिससे यह न केवल ऐतिहासिक बल्कि स्थापत्य दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है |
- यह हरा-भरा पार्क आज भी स्थानीय लोगों का प्रिय विश्राम स्थल तथा पर्यटकों का आकर्षण है, जहां स्वतंत्रता संग्राम का गौरव और देशभक्ति की भावना जीवंत रहती है |
भोजन :
यहाँ का मुख्य व्यंजन MG रोड और सिविल लाइंस मार्केट में समोसा, कचौड़ी, पार्क के बाहर के ठेले पर ठंडई, कुल्फी और सिविल लाइंस में कई शाकाहारी/मल्टी-कुज़ीन विकल्प कैफे और रेस्टोरेंट्स है |
कैसे पहुंचें?
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेलवे स्टेशन से दूरी | प्रयागराज जंक्शन से लगभग 3 किमी |
| बस/ऑटो/टैक्सी | शहर के किसी भी कोने से सीधी पहुँच |
| एयरपोर्ट से दूरी | लगभग 11 किमी (टैक्सी/कैब से 20-25 मिनट) |
6. लेटे हनुमान मंदिर (Reclining Hanuman Temple), प्रयागराज – भक्ति, चमत्कार और अनोखी मूर्ति का संगम
allahabad travel places: यह मंदिर लगभग 700 साल पुराना है और यहाँ भगवान हनुमान की विशिष्ट लेटी हुई मूर्ति स्थापित है, जो मानसून के दौरान आंशिक रूप से जलमग्न हो जाती है। मंदिर की यह अनूठी मूर्ति और यहाँ का धार्मिक वातावरण भक्तों को आकर्षित करता है।
लेटे हनुमान मंदिर, प्रयागराज के त्रिवेणी संगम तट पर स्थित एक अद्भुत और अनोखा धार्मिक स्थल है। यह भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ भगवान हनुमान जी की लेटे हुए अवस्था (Reclining posture) में प्रतिमा स्थापित है।
आस्था, इतिहास और चमत्कारों से भरा यह स्थल लाखों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है। कहा जाता है जब हनुमान जी लंका पर विजय प्राप्त करके वापिस लौट रहे थे | तब वे बहुत थक गए थे और तब माता सीता ने उन्हें विश्राम करने के लिए कहा तब वे वहा पर लेट गए | इसीलिए वहा पर लेटी हुई हनुमान जी की मूर्ति है | साथ ही, हनुमान जी के दाहिने हाथ में भगवान राम और लक्ष्मण की आकृति तथा बाएं हाथ में गदा सुशोभित है।
- यह भारत का इकलौता ऐसा प्रसिद्ध मंदिर है जहाँ हनुमान जी पूरी तरह लेटी मुद्रा में विराजमान हैं। यहाँ स्थापित प्रतिमा लगभग 20 फीट लंबी है, जो मंदिर के गर्भगृह में और धरातल से 6-8 फीट नीचे स्थित है |
- एक किंवदंती के मुताबिक कन्नौज के राजा ने संतान प्राप्ति की इच्छा से अपने गुरु के कहने पर विंध्याचल की चट्टानों से इस अद्वितीय प्रतिमा को बनवाया और उसे नाव से संगम के किनारे लाया। लेकिन प्रतिमा यहीं जलमग्न हो गई। वर्षों बाद, जलस्तर कम होने पर बाबा बालगिरी जी को यह मूर्ति मिली। तब राजा ने मंदिर का निर्माण करवाया |
- मुगल शासकों ने, विशेषकर अकबर और औरंगजेब के शासन में, इस मूर्ति को हटवाने की कोशिश की, परंतु मूर्ति हर बार और अधिक धरती में धँसती गई; अंततः हटाने वाले असफल रहे |
- महाकुंभ तथा अन्य विशेष अवसरों पर लाखों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि जब गंगा में बाढ़ आती है, तो उसके पानी से यह मूर्ति स्वतः स्नान करती है, और जलस्तर वापस घट जाता है – इस अलौकिक दृश्य को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं।
- मंदिर का गर्भगृह और प्रतिमा दोनों जमीन से काफी नीचे हैं, जिससे दर्शन के लिए सीढ़ियों का प्रयोग करना पड़ता है |
- यह मंदिर, प्रयागराज के त्रिवेणी संगम, अक्षयवट और अन्य धार्मिक स्थलों के साथ भारतीय आस्था, संस्कृति और अद्भुत मूर्तिकला का अद्वितीय संगम है – यहाँ दर्शन और पूजा से भक्तों को विशेष शांति और मनोकामना पूर्ति की अनुभूति होती है |
भोजन :
यहाँ मंदिर के बाहर ठंडई, चूरन, लड्डू , संगम मार्ग के लोकल ठेले पर पूड़ी-सब्जी, कचौड़ी, और घाट के पास ढाबे पर चाय-बिस्किट मिलता है |
कैसे पहुँचें?
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेल मार्ग | प्रयागराज जंक्शन से लगभग 7 किमी |
| बस/ऑटो/रिक्शा | शहर से संगम की ओर सीधा ऑटो मिलता है |
| पैदल | संगम पहुँचने के बाद नाव या पैदल चलकर मंदिर तक पहुँचा जा सकता है |
7. मिन्टो पार्क (Minto Park), प्रयागराज – इतिहास और शांति का एक सुंदर संगम (allahabad travel places)
1858 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ईयरल कैनिंग ने यहाँ क्वींस विक्टोरिया की घोषणा पढ़ी थी, जिसके बाद भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई। 1908 में इस स्थल पर एक स्तंभ स्थापित किया गया था। यह स्थल ऐतिहासिक महत्व रखता है और यहाँ का वातावरण शांतिपूर्ण है।
मिन्टो पार्क, जिसे अब आधिकारिक रूप से मदन मोहन मालवीय पार्क कहा जाता है, प्रयागराज का एक ऐतिहासिक और हरियाली से भरा सार्वजनिक स्थल है। यह पार्क यमुना नदी के तट पर स्थित है और भारत के औपनिवेशिक इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यह पार्क 1905 में ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड मिन्टो की भारत यात्रा की याद में विकसित किया गया था, इसलिए इसका नाम “मिन्टो पार्क” पड़ा। 1 नवंबर 1858 को ब्रिटिश क्राउन ने ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत का शासन अपने हाथ में लिया, और इसी स्थल पर एक ऐतिहासिक घोषणा की गई — इसे “ब्रिटिश राज की घोषणा स्थल” के रूप में जाना जाता है।
- यह पार्क 1910 में ब्रिटिश वायसराय लार्ड मिंटो द्वारा स्थापित किया गया था, जिसका नाम उन्होंने स्वयं इस जगह पर रखा था।
- 1 नवंबर 1858 को यहीं पर लॉर्ड कैनिंग ने महारानी विक्टोरिया का वह घोषणापत्र पढ़ा था, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत और ब्रिटिश क्राउन के अधीन भारत आने की घोषणा की गई थी। यह ऐतिहासिक घोषणा इसी मैदान में हुई थी, जिससे यह स्थल बेहद महत्वपूर्ण बन गया।
- पार्क में एक संगमरमर का स्मारक स्तंभ है, जिस पर चार शेर वाला भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अंकित है। यह स्तंभ स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है।
- 1950 के दशक में इस पार्क का नाम बदलकर महामना मदन मोहन मालवीय पार्क कर दिया गया, जो एक महान स्वतंत्रता सेनानी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक थे।
- पार्क इतिहास के साथ-साथ स्थानीय निवासियों के लिए एक प्रमुख सामाजिक और सांस्कृतिक केंद्र भी है, जहाँ विभिन्न कार्यक्रम और सभाएँ आयोजित होती हैं।
- यह पार्क एक हरा-भरा, शांत प्राकृतिक स्थल भी है, जो लोगों को विश्राम और प्रकृति का आनंद लेने का अवसर प्रदान करता है।
भोजन :
यहाँ स्ट्रीट फूड पार्क के बाहर छोटे ठेले – भेल, पानीपुरी, चाय, रेस्तरां सिविल लाइंस के रेस्टोरेंट्स और कैफे और संगम क्षेत्र प्रसाद की दुकानों पर मिठाइयाँ, पूड़ी-सब्जी मिल जाते हैं |
कैसे पहुँचें? (allahabad travel places)
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेल मार्ग | प्रयागराज जंक्शन से लगभग 6 किमी |
| बस/ऑटो/कैब | सिविल लाइंस या किला मार्ग से सीधा ऑटो या टैक्सी |
| संगम के पास से पैदल | संगम और किले से पैदल पहुँचने योग्य दूरी पर |
8. प्रयागराज संग्रहालय (Allahabad Museum) – इतिहास, कला और संस्कृति का जीवंत संग्रह
allahabad travel places: यह संग्रहालय भारतीय कला, संस्कृति और इतिहास का अद्भुत संग्रह प्रस्तुत करता है। यहाँ प्राचीन मूर्तियाँ, चित्र और अन्य कलाकृतियाँ प्रदर्शित हैं। इतिहास और कला प्रेमियों के लिए यह स्थल अत्यंत रोचक है।
यह संग्रहालय दूसरी शताब्दी से लेकर बाद के काल की आधुनिक युग की सुन्दर मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। निकोलस रोरिच की चित्रकलाएँ, राजस्थानी लघु आकृतियां, सिक्कों और दूसरी शताब्दी से आधुनिक युग की पत्थरों की मूर्तियाँ आदि इस संग्रहालय के मुख्य आकर्षण हैं।
प्रयागराज संग्रहालय, उत्तर भारत के प्रमुख संग्रहालयों में से एक है। यह संग्रहालय भारत की प्राचीन सभ्यता, स्वतंत्रता संग्राम, कला, साहित्य, और ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने का प्रमुख केंद्र है। यहाँ भारतीय इतिहास के कई अनदेखे और दुर्लभ पहलुओं को बेहद सुंदर और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
प्रयागराज संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1931 में हुई थी। शुरुआत में यह म्युनिसिपल बोर्ड भवन में स्थित था, लेकिन 1947 में वर्तमान स्थान पर शिफ्ट किया गया। यह संग्रहालय नेहरू परिवार, महात्मा गांधी, और चंद्रशेखर आज़ाद जैसी महान हस्तियों से भी जुड़ा है।
- यह संग्रहालय 1931 में स्थापित हुआ था, लेकिन इसकी आधारशिला 14 दिसंबर 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। इससे पहले 1863 में राजस्व परिषद ने पुस्तकालय और संग्रहालय के लिए प्रस्ताव पास किया था। प्रारंभ में 1878 में संग्रहालय आरनेट भवन में था, लेकिन बाद में 1954 में वर्तमान स्थान पर जनता के लिए खोला गया। 1985 में इसे भारतीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया गया |
- संग्रहालय में दूसरी शताब्दी से लेकर आधुनिक युग तक की मूर्तियों, चित्रकला (जैसे निकोलस रोरिच की चित्रकलाएँ), राजस्थानी लघु आकृतियाँ, सिक्के, गुप्त काल से जुड़ी वस्तुएं, चित्रों, कलाकृतियों और ऐतिहासिक वस्तुओं का अद्भुत संग्रह है। चंद्रशेखर आजाद की माउज़र पिस्तौल भी यहाँ प्रदर्शित है। कुल 18 गैलरी हैं जहाँ विविध वस्तुएं सजीव रूप में देखी जा सकती हैं |
- संग्रहालय का पुस्तकालय उत्तर भारत में कला और पुरातत्व से संबंधित पुस्तकों का एक बड़ा स्रोत है, जिसमें लगभग 30,000 पुस्तकें और अनुसंधान पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। यह शोधार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है |
- यह संग्रहालय चंद्रशेखर आजाद पार्क के हरे-भरे वातावरण में स्थित है, जो परिसर को मनमोहक और शांतिपूर्ण बनाता है। संग्रहालय सोमवार को छोड़कर प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है।
- यह भारतीय सरकार द्वारा वित्तपोषित है और देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और अध्ययन के लिए समर्पित है। इसके प्रमुख उद्देश्य संग्रहालय के विकास हेतु शोध को प्रोत्साहित करना, कलाकृतियों का संरक्षण, और भारत व अन्य देशों के सांस्कृतिक संस्थानों के साथ सहयोग है |
भोजन :
यहाँ खाने पीने के सामान जैसे स्ट्रीट फूड पार्क के बाहर ठेले – भेलपुरी, समोसा, कुल्फी, कैफे: सिविल लाइंस रोड पर छोटे कैफे और टी स्टॉल्स और रेस्टोरेंट: MG रोड के आसपास अच्छे परिवारिक रेस्टोरेंट पे मिल जाते हैं |
कैसे पहुँचें?
| साधन | विवरण |
|---|---|
| रेलवे स्टेशन से दूरी | प्रयागराज जंक्शन से लगभग 4 किमी |
| बस/ऑटो/कैब | सिविल लाइंस और MG रोड से आसानी से उपलब्ध |
| हवाई अड्डा | प्रयागराज एयरपोर्ट से लगभग 11 किमी दूर |
9. विक्टोरिया मेमोरियल (Victoria Memorial), प्रयागराज – ब्रिटिश विरासत का गवाह
विक्टोरिया जब अंग्रेजो की महारानी बनी तब उनके याद में अनेको स्मारक बनवाये गए | उनमे से एक छतरी वाली स्मारक इटैलियन स्टोन से भी बना था | जिसे 1906 में जेम्स डिग्स् ला टॉचे ने इसका उद्घाटन किया और आम जनता के लिए खोल दिए |
यह स्मारक ब्रिटिश शासन के दौरान निर्मित हुआ था और यह ब्रिटिश वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह स्मारक ऐतिहासिक महत्व रखता है और यहाँ का वातावरण शांतिपूर्ण है।
विक्टोरिया मेमोरियल प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) के ऐतिहासिक चंद्रशेखर आज़ाद पार्क (जिसे पहले अल्फ्रेड पार्क कहा जाता था) के भीतर स्थित एक ब्रिटिशकालीन स्मारक है। यह स्मारक ब्रिटिश साम्राज्य की महारानी क्वीन विक्टोरिया की याद में बनाया गया था और आज भी औपनिवेशिक भारत की वास्तुकला, राजनीतिक इतिहास और विरासत का प्रतीक बना हुआ है।
विक्टोरिया मेमोरियल की स्थापना 1906 में क्वीन विक्टोरिया की मृत्यु (1901) के पश्चात की गई थी। इसका निर्माण ब्रिटिश राज में भारत के लोगों से “पब्लिक सब्सक्रिप्शन” द्वारा जुटाए गए धन से हुआ था। इसका उद्देश्य था — ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत, संस्कृति और रानी विक्टोरिया के प्रति सम्मान को दर्शाता है |
- यह स्मारक 24 मार्च 1906 को उद्घाटित किया गया था और इसे इंग्लिश वास्तुकार जेम्स डिग्ज लाटूश ने डिजाइन किया था। यह चंद्रशेखर आजाद पार्क के विशाल परिसर के अंदर एक कैनोपी रूपी इमारत है, जो इतालवी चूने के पत्थर से निर्मित है।
- मैदान के बीचोंबीच पहले महारानी विक्टोरिया की विशाल मूर्ति भी स्थापित थी, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया।
- यह स्मारक ब्रिटिश हुकूमत की प्रमुख निशानी के रूप में वास्तुकला में ब्रिटिश और भारतीय शैलियों का संयोजन दर्शाता है, जिसे इंडो-सारासेनिक रिवाइवल शैली कहा जाता है।
- विक्टोरिया मेमोरियल राष्ट्रीय महत्व का केंद्रीय स्मारक है, जो ब्रिटिश राज के दौर की वास्तुशिल्प और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखता है।
- यहाँ भव्य बाग, फव्वारे और उत्कृष्ट नक्काशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, तथा महल के अंदर विभिन्न चित्रकारी, कला संग्रह और ऐतिहासिक दस्तावेज प्रदर्शित किए गए हैं।
- यह स्मारक चंद्रशेखर आजाद पार्क के भीतर स्थित होने के कारण पर्यटकों के लिए एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल भी है, जहाँ इतिहास, कला और शांति का अनुभव होता है।
- विक्टोरिया मेमोरियल अपने समय का एक प्रमुख ब्रिटिश ऐतिहासिक स्थल है, जो उस युग के औपनिवेशिक प्रभाव और राजनीतिक इतिहास का गवाह है।
भोजन :
यहाँ पे पार्क के बाहर ठेले पे चाय-नाश्ता, MG रोड, सिविल लाइंस क्षेत्र में समोसे, कचौड़ी और निकटतम है CIC टावर और लोकल कैफे रूट पे रेस्तरां है |
कैसे पहुँचें?
| साधन | दूरी और विवरण |
|---|---|
| रेल मार्ग | प्रयागराज जंक्शन से 3.5 किमी |
| हवाई मार्ग | प्रयागराज एयरपोर्ट से 11 किमी |
| ऑटो/कैब | सिविल लाइंस और MG रोड से सीधे पहुँच |
| पास के स्थल | प्रयागराज संग्रहालय, चंद्रशेखर आज़ाद प्रतिमा, आनंद भवन |
10. संगम घाट (Sangam Ghat) (allahabad travel places)
यह घाट त्रिवेणी संगम का हिस्सा है और यहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं। यहाँ का धार्मिक वातावरण और संगम की पवित्रता भक्तों को आकर्षित करती है।
संगम घाट प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद) का सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक स्थल है। यह स्थान भारत के सबसे पवित्र तीर्थ स्थलों में गिना जाता है, जहां गंगा, यमुना, और सरस्वती नदियाँ मिलती हैं। इसे त्रिवेणी संगम के नाम से भी जाना जाता है और यहाँ की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्वता अत्यधिक है।
- संगम घाट वह स्थान है जहाँ गंगा और यमुना का प्रत्यक्ष मिलन होता है और सरस्वती नदी गुप्त रूप से इसमें सम्मिलित होती है, इसलिए इसे त्रिवेणी संगम के नाम से जाना जाता है। यह संगम हिन्दू धर्म में पवित्रता, शुद्धता और आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है |
- मान्यता है कि यहाँ स्नान मात्र से पाप गृहस्थ हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए लाखों श्रद्धालु हर बारह वर्ष में लगने वाले महाकुंभ मेला समेत अन्य अवसरों पर यहाँ स्नान के लिए आते हैं |
- पुराणों में प्रयाग का उल्लेख एक प्राचीन धार्मिक स्थल के रूप में होता है जहां भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि के निर्माण के बाद सबसे पहला यज्ञ किया था। यहाँ प्राचीन राजाओं के अभिषेक भी होते थे और राम भगवान वनवास के दौरान इसी इलाके से गुजरे थे |
- संगम घाट क्षेत्र को अक्षय क्षेत्र कहा जाता है, यानी यहाँ किए गए धर्म-कर्म का पुण्य कभी समाप्त नहीं होता |
- संगम घाट महाकुंभ के मुख्य स्नान स्थल के रूप में प्रसिद्ध है जहां भक्तगण संगम के पावन जल में स्नान कर आध्यात्मिक शांति और मनोकामना पूर्ति की इच्छा करते हैं |
- यहाँ संस्कार, पितृ तर्पण, पूजा, जलाभिषेक जैसी धार्मिक क्रियाएं भी बड़े पैमाने पर सम्पन्न होती हैं।
- प्रयागराज में कुल 41 घाट हैं, लेकिन संगम घाट की विशेष धार्मिक प्रसिद्धि है। कुछ श्रद्धालु केवल संगम घाट पर स्नान को सर्वोपरि मानते हैं, हालांकि विद्वानों के अनुसार पूरे प्रयागराज क्षेत्र के घाट समान पुण्यदायी हैं |
नज़दीकी खाने-पीने के विकल्प
| व्यंजन | स्थान |
|---|---|
| स्ट्रीट फूड | संगम घाट के पास छोटे-छोटे ठेले – पानीपुरी, भेलपुरी, समोसा |
| पारंपरिक भारतीय भोजन | सिविल लाइंस और संगम के आस-पास के रेस्टोरेंट्स |
| मिठाइयाँ | संगम घाट के पास लड्डू, हलवा और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ |
यात्रा सारणी
| स्थल का नाम | स्थान | प्रवेश शुल्क | समय | प्रमुख आकर्षण |
|---|---|---|---|---|
| त्रिवेणी संगम | संगम क्षेत्र | ₹0 | 24 घंटे | पवित्र स्नान, कुम्भ मेला |
| इलाहाबाद किला | यमुनानगर | ₹50 | 10 AM – 5 PM | ऐतिहासिक किला, अशोक स्तंभ |
| खुसरो बाग | खुसरो बाग रोड | ₹10 | 6 AM – 6 PM | मुग़ल वास्तुकला, समाधियाँ |
| स्वराज भवन | अल्फ्रेड पार्क | ₹20 | 10 AM – 4 PM | नेहरू परिवार की यादें |
| चंद्रशेखर आज़ाद पार्क | जॉर्जटाउन | ₹0 | 6 AM – 8 PM | स्वतंत्रता संग्राम इतिहास |
| लेटे हनुमान मंदिर | त्रिवेणी संगम | ₹0 | 5 AM – 8 PM | लेटी हुई हनुमान मूर्ति |
| मिन्टो पार्क | यमुनानगर | ₹10 | 6 AM – 6 PM | ऐतिहासिक स्थल, शांति का वातावरण |
| प्रयागराज संग्रहालय | सिविल लाइन्स | ₹20 | 10 AM – 5 PM | प्राचीन कलाकृतियाँ |
| विक्टोरिया मेमोरियल | अल्फ्रेड पार्क | ₹30 | 9 AM – 6 PM | ब्रिटिश वास्तुकला, स्मारक |
| संगम घाट |
Allahabad Travel & Restaurant Budget (Per Person)
| Category | Option | Estimated Cost (INR) | Notes |
|---|---|---|---|
| Travel to Allahabad | Train (Sleeper Class) | ₹300 – ₹500 | Budget travel; prior booking advised |
| Train (3AC) | ₹800 – ₹1,200 | Comfortable mid-range option | |
| Bus (AC/Non-AC) | ₹400 – ₹1,000 | Cost varies by distance and operator | |
| Flight (Economy) | ₹2,000 – ₹6,000 | From major cities like Delhi, Mumbai, Kolkata | |
| Local Transport | Auto Rickshaw | ₹100 – ₹300/day | For short local rides |
| Ola/Uber/Taxi | ₹200 – ₹500/day | App-based services, more comfort | |
| Restaurant/Food | Street Food/Dhaba | ₹100 – ₹200/day | Basic meals: poori-sabzi, chaat, etc. |
| Mid-range Restaurant | ₹300 – ₹600/day | Full thali, biryani, north Indian dishes | |
| High-end Restaurant | ₹800 – ₹1,500/day | Multi-course meals or fine dining |
Example Total Daily Budgets
| Traveler Type | Daily Budget (INR) | Includes |
|---|---|---|
| Budget Traveler | ₹600 – ₹1,000 | Sleeper train, local food, rickshaw |
| Comfort Traveler | ₹1,500 – ₹2,500 | 3AC train, mid-range food, taxi/auto |
| Luxury Traveler | ₹3,500+ | Flights, high-end dining, private transport |
निष्कर्ष
प्रयागराज की ये 10 जगहें न केवल आपकी यात्रा को यादगार बनाएंगी, बल्कि आपको शहर की गहरी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत से भी जोड़ेंगी। हर स्थल की अपनी खासियत है — चाहे वह धार्मिक आस्था हो, इतिहास की गहराई हो, या प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद। अपनी रुचि और समय के अनुसार इन स्थलों का चयन करें और प्रयागराज की यात्रा का भरपूर आनंद लें।
FAQ
कौन से स्थान आपकी आत्मा को शांति और आनंद देते हैं?
आत्मा को शांति और आनंद देने वाले स्थान
1. धार्मिक स्थल
मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा जैसे पवित्र स्थानों पर जाकर ध्यान, प्रार्थना और आराधना करने से आत्मा को गहरी शांति और आनंद की अनुभूति होती है|
2. प्राकृतिक स्थल
नदियों के किनारे, झील, पहाड़, बाग-बगिचे और शांत पार्कों में समय बिताने से मन को सुकून और आत्मा को आनंद मिलता है।
3. ध्यान और साधना स्थल
आश्रम, योग केंद्र, ध्यान स्थल या एकांत जगहों पर ध्यान, साधना और आत्मचिंतन करने से भी आत्मा को शांति और आनंद प्राप्त होता है|
4. सेवा और परोपकार के स्थान
जहां लोग सेवा, दान और परोपकार करते हैं, वहां भी आत्मा को गहरा संतोष और आनंद मिलता है
