Top 10 शानदार Azamgarh me ghumne ki jagah जो आपको चौंका देंगी

Azamgarh me ghumne ki jagah: आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध जिला है। यह जिला तमसा नदी के तट पर स्थित है और इसका मुख्यालय भी आज़मगढ़ शहर में है।

भौगोलिक दृष्टि से, आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में स्थित है। यह जिला लखनऊ-बलिया राज्य राजमार्ग पर स्थित है और लखनऊ से लगभग 269 किमी दूर है।

आजमगढ़ का इतिहास प्राचीन और विविधतापूर्ण है। यह क्षेत्र कभी कोसला साम्राज्य का हिस्सा था, जो बुद्ध के समय में एक प्रमुख राज्य था। इसके बाद, यह मल्ल साम्राज्य का हिस्सा बना। आजमगढ़ जिले में प्राचीन अवशेषों की कमी है, लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व निर्विवाद है। इसका क्षेत्रफल 4,054 वर्ग किलोमीटर ,औसत ऊँचाई: 64 मीटर (209 फीट) है |

आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय जलवायु, जिसमें गर्मियों में तापमान 22°C से 46°C और सर्दियों में 5°C के आसपास रहता है। यहाँ की मुख्य नदियाँ: घाघरा, टोंस, उदंती, और बेरू है | आजमगढ़ को “कैफ़ी आज़मी नगर” के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहाँ के मशहूर उर्दू शायर कैफ़ी आज़मी का जन्म हुआ था। यह जिला साहित्य, संगीत, और कला के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

यहाँ के लोग शिक्षा के प्रति जागरूक हैं और कई शैक्षिक संस्थान यहाँ स्थापित हैं।​ आजमगढ़ जिले में 8 तहसीलें, 22 विकासखंड, 13 नगर पालिकाएँ और 26 पुलिस स्टेशन हैं। इसमें कुल 4,101 गाँव स्थित हैं। यह जिला आज़मगढ़ मण्डल का मुख्यालय भी है, जिसमें मऊ और बलिया जिले शामिल हैं।

आजमगढ़ में वस्त्र उद्योग विशेष रूप से रेशमी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की साड़ियों में “पल्लू” पर रेशमी कढ़ाई का बेहतरीन समायोजन किया जाता है। इसके अलावा, काली मिट्टी के बर्तन, हथकरघा, और खाद्य प्रसंस्करण जैसे उद्योग भी यहाँ प्रमुख हैं।

कैसे पहुँचें: आजमगढ़ रेल और सड़क दोनों माध्यमों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा वाराणसी में है।

सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च के बीच का समय सबसे अच्छा होता है।

कहाँ ठहरें: आजमगढ़ में बजट से लेकर मिड-रेंज होटल उपलब्ध हैं।

यहां कई ऐसे स्थल हैं जो आपको प्रकृति, इतिहास और लोक संस्कृति का अद्भुत अनुभव कराते हैं। इस लेख में हम जानेंगे “Azamgarh me ghumne ki jagah” के अंतर्गत आने वाली 10 प्रमुख जगहों के बारे में, जो आपकी यात्रा को यादगार बना सकती हैं।

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आजमगढ़ पहुँचने के साधन और वहाँ के बजट रेस्टोरेंट्स

साधन (आजमगढ़ पहुँचने के)विवरणबजट (लगभग)रेस्टोरेंट्स (बजट में)औसत खर्च (प्रति व्यक्ति)
ट्रेनआजमगढ़ रेलवे स्टेशन, प्रमुख शहरों से सीधी ट्रेनें उपलब्ध (दिल्ली, लखनऊ, बनारस)₹200 – ₹800 (स्लीपर क्लास)अन्नपूर्णा भोजनालय, शिवा भोजनालय, गुप्ता रेस्टोरेंट₹100 – ₹200
बसउत्तर प्रदेश राज्य परिवहन की बस सेवाएँ उपलब्ध हैं₹300 – ₹600पंजाबी ढाबा, बद्रीनाथ भोजनालय₹80 – ₹150
टैक्सी / कैबनिजी कैब्स ओला/उबर (निकटतम बड़े शहरों से)₹2000 – ₹5000साईं रेस्टोरेंट, आजमगढ़ किचन₹150 – ₹250
निजी वाहनअपनी गाड़ी से (दिल्ली से लगभग 800 किमी)₹3000 – ₹5000 (ईंधन)वही उपरोक्तवही उपरोक्त

1. ठेकमा किला (Thekma Fort)(Azamgarh me ghumne ki jagah)

​ठेकमा किला (Thekma Fort) उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले में स्थित एक ऐतिहासिक किला है, जो अपनी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह किला आज़मगढ़ शहर से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित ठेकमा गाँव में स्थित है।

ठेकमा किला मुघल काल का एक महत्वपूर्ण किला है, जिसे मुग़ल सम्राट अकबर के शासनकाल में बनवाया गया था। किले की स्थापत्य कला और उसकी संरचना उस समय की सैन्य रणनीतियों और वास्तुकला को दर्शाती है। किले के भीतर बने विभिन्न कमरे, बुरुज और दीवारें उस समय की युद्धकला और संरक्षण की तकनीकों को प्रदर्शित करते हैं।​

जलाशय और जल प्रबंधन: किले के भीतर जलाशयों की व्यवस्था की गई थी, जिससे पानी की आपूर्ति सुनिश्चित होती थी। यह विशेषता किले की आत्मनिर्भरता को दर्शाती है। प्राकृतिक सौंदर्य: किले के आसपास के क्षेत्र में हरियाली और वन्य जीवन का आनंद लिया जा सकता है।​

  • यह किला आज़मगढ़ जिले के ठेकमा गाँव में स्थित है, और इस क्षेत्र के प्राचीनतम किलों में गिना जाता है—यह 100 साल से भी अधिक पुराना है |
  • ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, इस किले का निर्माण 1498 ईस्वी में हसन शाह सूरी (जो शेर शाह सूरी के पिता थे) ने कराया था। इस वजह से यह किला शेर शाह सूरी के वंशजों से भी जुड़ा हुआ है, जो मध्य भारत के शक्तिशाली शासकों में गिने जाते हैं।
  • जैसे-जैसे समय बीता, किले का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया है, और आज भी इसका शेष भाग खंडहर में तब्दील होता जा रहा है |
  • ठेकमा किला उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में मौजूद ऐतिहासिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहां की स्थानीय भाषाएँ हिंदी और उर्दू हैं, और यह जगह आज़मगढ़ मुख्यालय से लगभग 25-26 किलोमीटर दूर है |
  • आज के दौर में किले का प्रांगण स्थानीय लोगों के लिए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, लेकिन देखरेख की कमी के कारण इसकी स्थिति जर्जर हो रही है |
  • यह किला गंगा-घाघरा-तमसा जैसी नदियों के इलाके में स्थित है, जहां का भूगोल और ऐतिहासिक विरासत इसे खास बनाती है |

कैसे पहुँचें: आज़मगढ़ शहर से ठेकमा गाँव तक पहुँचने के लिए निजी वाहन या टैक्सी की सुविधा उपलब्ध है।

सर्वोत्तम समय: किले की यात्रा के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय उपयुक्त है, जब मौसम ठंडा और सुखद होता है।​

सुविधाएँ: किले के आसपास बुनियादी सुविधाएँ जैसे पानी, स्नानघर और विश्राम स्थल उपलब्ध हैं।

किले की यात्रा के दौरान देखने योग्य स्थल : किले की दीवारें और बुरुज, जलाशय ,पुराने दरवाजे, खंडहर, और स्थानीय गाइड से सुनाई जाने वाली ऐतिहासिक कहानियाँ।|आश्रम में एक बड़ा पुस्तकालय है, जिसमें प्राचीन ग्रंथ और धर्मशास्त्र की पुस्तकें उपलब्ध हैं।

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2. दुर्वासा आश्रम

उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के फूलपुर तहसील के गजड़ी गाँव में स्थित दुर्वासा ऋषि आश्रम एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। यह स्थान तमसा और मंजूषा नदियों के संगम पर स्थित है, जो इसे धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक पवित्र बनाता है ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि दुर्वासा ने 12 वर्ष की आयु में चित्रकूट से इस स्थान पर आकर कई वर्षों तक घोर तपस्या किये थे | सतयुग, त्रेतायुग और द्वापर युग में महर्षि दुर्वासा का स्थान श्रेष्ठ माना गया है ।

यह स्थल भगवान शिव और माता पार्वती से भी गहरे संबंध रखता है, और यहां भगवान राम द्वारा स्थापित शिवलिंग की मान्यता भी है ।​ आश्रम में एक बड़ा पुस्तकालय है, जिसमें प्राचीन ग्रंथ और धर्मशास्त्र की पुस्तकें उपलब्ध हैं।

हर साल कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां तीन दिवसीय मेला आयोजित होता है, जिसमें लगभग 2 से 3 लाख श्रद्धालु स्नान और पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। इसके अलावा, श्रावण और अन्य प्रमुख पर्वों पर भी विशेष आयोजन होते हैं ।​

यहां आने वाले भक्तों के लिए पंचकोसी परिक्रमा करना अनिवार्य माना जाता है। यह परिक्रमा तमसा और मंजूषा नदियों के किनारे स्थित तीन प्रमुख आश्रमों—दुर्वासा, दत्तात्रेय और चंद्रमा मुनि आश्रम—की परिक्रमा करके पांच कोस की दूरी तय की जाती है। इस परिक्रमा के बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है ।​

  • दुर्वासा आश्रम उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के फूलपुर से लगभग 6 किलोमीटर उत्तर में स्थित है, जहाँ तमसा और मंजूषा नदियों का संगम होता है |
  • कहा जाता है कि महर्षि दुर्वासा सती अनुसूइया और अत्रि मुनि के पुत्र थे। वे सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग—तीनों युगों में इसी स्थान पर तपस्या करते रहे |
  • आश्रम में दुर्बाषेश्वर महादेव और अन्य मंदिर हैं। दुर्वासा ऋषि की प्राचीन प्रतिमा भी स्थापित है, जिसे खुली आँखों से देर तक देख पाना कठिन समझा जाता है|
  • प्राचीन समय में यहाँ हज़ारों विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे, जिससे यह स्थान ऋषि-मुनियों की सांस्कृतिक और शैक्षिक तपोस्थली बना |
  • आश्रम का वातावरण अत्यंत शांत और पवित्र है, जहाँ साधना और ध्यान करना बेहद शुभ माना जाता है। यहाँ एक बड़ा पुस्तकालय भी है जिसमें दुर्लभ ग्रंथ उपलब्ध हैं |
  • आज़मगढ़ में दुर्वासा, दत्तात्रेय और चंद्रमा—तीनों भाइयों के पावन धाम मौजूद हैं |
  • वर्तमान में इस आश्रम के सौंदर्यीकरण और विकास हेतु 76 लाख की परियोजना स्वीकृत हुई है |

कैसे पहुँचें

स्थान: गजड़ी गाँव, फूलपुर तहसील, आज़मगढ़ जिला, उत्तर प्रदेश

निकटतम रेलवे स्टेशन: फूलपुर रेलवे स्टेशन (लगभग 6 किलोमीटर)

निकटतम हवाई अड्डा: लखनऊ एयरपोर्ट (लगभग 270 किलोमीटर)

3. मुक्ति धाम – राजघाट(Azamgarh me ghumne ki jagah)

घाघरा नदी के तट पर स्थित मुक्ति धाम आज़मगढ़ का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहाँ श्रद्धालु अपने पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण करते हैं। यह जगह न केवल धार्मिक बल्कि शांतिप्रिय पर्यटन स्थल के रूप में जानी जाती है।

मुक्तिधाम – राजघाट, आजमगढ़ शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित है और यह मुख्यतः अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के लिए उपयोग होता है।

  • आजमगढ़ का राजघाट प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। यहां कई ऋषि-मुनियों के आश्रम रहे हैं और यह क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों का केंद्र रहा है |
  • ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, आजमगढ़ में कई प्राचीन मंदिर और मठ भी हैं, जिनका संबंध राजघाट क्षेत्र से है |
  • राजघाट के पास गणेश मंदिर, ईदगाह, कदम रसूल जैसे धार्मिक स्थल भी स्थापित किए गए हैं |
  • राजघाट को मुक्ति धाम भी कहा जाता है, क्योंकि यहां अंतिम संस्कार किए जाते हैं और यह स्थान मोक्ष (मुक्ति) का प्रतीक माना जाता है |
  • धार्मिक आयोजनों के दौरान यहां वैदिक मंत्रोच्चार, मंगल गीत, और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, जिसमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं |

यात्रा सुझाव: यहाँ सुबह-सुबह का समय बहुत शांत और दिव्य अनुभव देता है।

कैसे पहुँचें

रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन आजमगढ़ है, जो लगभग 15 किलोमीटर दूर है।

सड़क मार्ग: आजमगढ़ से राजघाट तक पहुँचने के लिए निजी वाहन या ऑटो की सुविधा उपलब्ध है।

वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा वाराणसी है, जो लगभग 100 किलोमीटर दूर है।

4. सरयू नदी घाट

उत्तर प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में स्थित आजमगढ़ जिला, अपनी ऐतिहासिक धरोहर और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। इनमें से एक प्रमुख स्थल है सरयू नदी घाट, जो न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सरयू नदी घाट का धार्मिक महत्व अत्यधिक है। यह स्थल महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान राम और लक्ष्मण के आगमन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि राम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ सरयू नदी के किनारे स्थित इस घाट पर पहुंचे थे और राक्षसों पर विजय प्राप्ति के लिए भैरव देव की पूजा की थी। इस घटना के कारण यह स्थल धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। ​

  • छोटी सरयू नदी आज़मगढ़ जिले से होकर निकलती या बहती है, जिसे स्थानीय तौर पर पौराणिक, ऐतिहासिक और आर्थिक दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण मानते है। इसका मुख्य घाट कम्हरिया घाट है, जिससे पूर्व दिशा में कम्हरिया मांझा से यह नदी निकलती है। इसी घाट के पास पिकिया नदी का छोटी सरयू से संगम होता है
  •  ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन काल में ऋषि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए भगवान राम और लक्ष्मण इसी नदी के दाहिने तट से होकर गए थे। एक स्थानीय कहानी के अनुसार 23वें त्रेतायुग में प्रजापति दक्ष ने यहीं यज्ञ किया था, जिसमें माता सती ने अपने प्राण दिए थे |
  •  घाट के आसपास स्थानीय मेले, धार्मिक अनुष्ठान और स्नान का विशेष महत्व है। यहाँ संगम स्थल (जहां पिकिया मिलती है) पर मोहरे बाबा का स्थान भी प्रसिद्ध है
  • छोटी सरयू नदी कभी आजमगढ़ जिले के कई गाँवों की जीवन रेखा थी – सिंचाई, पेयजल व दैनिक जीवन के लिए इसी पर निर्भर करती थी। आज भी इसका घाट क्षेत्र कई लोगों के लिए आजीविका और धार्मिक कार्यों का केंद्र है
  • आज के समय में, नदी के प्रदूषण, जल की कमी और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण घाट व नदी दोनों संकट का सामना कर रहे हैं, लेकिन हाल के वर्षों में स्थानीय नागरिकों द्वारा छोटी सरयू को पुनर्जीवित करने के कई प्रयास किए गए हैं
  • छोटी सरयू का घाट आज़मगढ़ की धार्मिक सामाजिक पहचान का भाग है, और यह गंगा-घाघरा-तमसा-शारदा जैसी नदियों के क्षेत्रीय तंत्र का महत्वपूर्ण भाग है।

प्रमुख स्थल और संरचनाएँ

भैरव देव मंदिर: यह मंदिर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान राम और लक्ष्मण के आगमन से जुड़ा हुआ है। यहां राक्षसों पर विजय प्राप्ति के लिए भैरव देव की पूजा की जाती है।

पाताल गंगा सरोवर: यह सरोवर भूमिगत जल स्रोत से भरता है, हालांकि उचित देखभाल के अभाव में यह अब बंद हो चुका है।

365 कुएं: मंदिर परिसर में कभी 365 कुएं थे, जो अब भग्न हो चुके हैं।

शिवलिंग और अन्य प्रतिमाएँ: मंदिर में भगवान शिव के शिवलिंग के अलावा राम, लक्ष्मण और महर्षि विश्वामित्र की प्रतिमाएँ स्थापित हैं।

5. नेहरू हॉल और पुस्तकालय

अगर आप इतिहास और साहित्य में रुचि रखते हैं, तो नेहरू हॉल और इसका पुस्तकालय ज़रूर देखें। यह जगह स्थानीय छात्रों और साहित्यप्रेमियों के लिए ज्ञान का केंद्र है।

विशेष: यहां आपको हिंदी और उर्दू साहित्य की दुर्लभ किताबें मिलेंगी।

  • यहाँ पर विभिन्न संगठनों, स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सरकारी विभागों द्वारा समय-समय पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जैसे कि भविष्य ज्योति सम्मान समारोह, प्रबुद्ध समागम, मण्डलीय संगोष्ठी, जयंती समारोह आदि |
  • यह हॉल आजमगढ़ के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है, जहाँ जिले के प्रमुख लोग, अधिकारी, राजनेता और छात्र-छात्राएँ नियमित रूप से जुड़ते हैं |
  • उपलब्ध स्रोतों में नेहरू हॉल के साथ किसी स्वतंत्र “पुस्तकालय” का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
  • आमतौर पर, ऐसे सभागारों में एक छोटा पुस्तकालय या वाचनालय भी हो सकता है, लेकिन आजमगढ़ के नेहरू हॉल के संदर्भ में इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण इन स्रोतों में नहीं मिलता।
  • यदि आपको नेहरू हॉल से जुड़े पुस्तकालय के बारे में विशेष जानकारी चाहिए, तो जिला प्रशासन या स्थानीय सूचना स्रोतों से संपर्क किया जा सकता है।

6. निज़ामाबाद – ब्लैक पॉटरी की नगरी

निज़ामाबाद गाँव आज़मगढ़ जिले का गौरव है। यह गांव अपनी अनोखी काली मिट्टी की पॉटरी (Black Pottery) के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है। यहाँ के कारीगरों की कला देखते ही बनती है।

निजामाबाद-आजमगढ़ ब्लैक पाॅटरी के नाम से जाना जाता है। पौराणिकता के अनुसार सामंती शासको ने फारसी शैली से प्रभावित होकर कुछ कारीगरों को वह से बुलाया था बर्तन तथा फलदान बनाने के लिए | बरतनों को काबीज या आम की छाल, बास के पत्तों और आरूश या आधातोड़ा के पत्तों वली मिट्टी की पर्ची से धोया जाता है और फिर तपाने से पहले सरसों के तेल से रगड़ा जाता है, जिसके पश्चात् यह बर्तनों को चमकदार और चिकनी फिनिशिंग देता है और सतह को खरोंच से भी बचाता है।

निजामाबाद में बनाई जाने वाली ब्लैक पॉटरी की परंपरा 300 साल पुरानी है. यह कला मुगलकाल की महत्वपूर्ण कलाओं में से एक रही है, जिसे आजमगढ़ के कलाकारों ने आज भी जीवित रखा है. उन्होंने इसे केवल कला के रूप में नहीं, बल्कि एक रोजगार का साधन भी बना लिया है. वर्तमान में लगभग 50 से अधिक परिवार इस कला को जीवित रखने और आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं.  

क्या खरीदें: काले रंग के फूलदान, दीये और शोपीस।

  • निज़ामाबाद की ब्लैक पॉटरी UNIK और पारंपरिक कारीगरी का अनूठा संगम है, जिसे काले रंग की चमकदार सतह और उसमें खुदी हुई चांदी जैसी डिजाइन के लिए पहचाना जाता है |
  • इस काली रंग की पॉटरी को तैयार करने के लिए स्थानीय तालाबों की मिक़ा-युक्त चिकनी मिट्टी का प्रयोग होता है।
  • बर्तन बनाकर उन्हें खुली हवा में सुखाया जाता है, फिर उन पर सरसों का तेल रगड़कर भट्टी में ऑक्सीजन-रहित (air-tight) माहौल में पकाया जाता है, जिससे चमकदार काला रंग प्राप्त होता है
  • फायरिंग के बाद, इन पर नक्काशी बनाकर उसमें जस्ता, चांदी का पाउडर और कभी-कभी पारा भरा जाता है, जिससे डिजाइन में सिल्वर जैसी चमक आती है |
  • कहा जाता है कि यह कला करीब 300 साल पुरानी है और मुगल सम्राट औरंगजेब के समय गुजरात के कच्छ से लाई गई थी, जिसे बाद में स्थानीय कारीगरों ने अपनी खास पहचान दी |
  • इसकी शैली पर ‘बिदरीवेयर’ (हैदराबाद की प्रसिद्ध सिल्वर वर्क) का प्रभाव भी माना जाता है |
  • आज भी लगभग 50-200 परिवार इस शिल्प से जुड़े हैं लेकिन कच्चे माल और अन्य संसाधनों की कमी के कारण आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं |
  • यह कला “वन डिस्ट्रिक्ट, वन प्रोडक्ट” (ODOP) योजना के तहत है और साल 2015 में इसे GI टैग (Geographical Indication) भी मिला है |
  • ब्लैक पॉटरी से सुराही, फूलदान, प्लेट, कटोरे, दीये, पूजा सामग्री, सजावटी शोपीस आदि बनाए जाते हैं |
  • भारत सहित विदेशों में भी आजमगढ़ की पहचान इसकी ब्लैक पॉटरी के जरिए होती है |
  • बर्तनों की नक्काशी और सजावट में अक्सर घर की महिलाएं भी सहभागी होती हैं |

7. लालगंज का हाट बाजार(Azamgarh me ghumne ki jagah)

लालगंज हाट बाजार उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के लालगंज कस्बे में स्थित एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र है। यह बाजार स्थानीय निवासियों के लिए आवश्यक वस्त्र, खाद्य सामग्री, घरेलू सामान, कृषि उत्पाद, मछली, मुर्गा, मांस, फल, सब्जियाँ, मसाले, बर्तन, स्टेशनरी, और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है।

दुर्गा पूजा मेला: यह मेला लालगंज, मेंहनगर, माहुल, और जाफरपुर में आयोजित होता है। इस दौरान भव्य पंडालों की सजावट, रंग-बिरंगी लाइटों की छटा, और भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। रूट डायवर्जन की व्यवस्था की जाती है ताकि यातायात सुचारू रूप से चल सके।

  • लालगंज बाजार में दो दिवसीय ऐतिहासिक मेला होता है, जिसमें कई लोग दूर-दूर से आते हैं और भीड़ उमड़ती है। इस मेला को स्थानीय संस्कृति और व्यवसाय का महत्वपूर्ण अंग मानते हैं |
  • यह बाजार स्थानीय लोगों के लिए खरीद-फरोख्त का प्रमुख केंद्र है, जहाँ विभिन्न प्रकार के दैनिक उपयोग की वस्तुएं, स्थानीय उत्पाद, फलों, सब्जियों, कपड़े, गहने इत्यादि मिलते हैं।
  • बाजार में समय-समय पर घटनाएं और सुरक्षा चुनौतियां भी सामने आती हैं, लेकिन यह क्षेत्र स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा नियंत्रित किया जाता है
  • लालगंज बाजार का क्षेत्र आजमगढ़ के देवगांव क्षेत्र में बसा है और व्यापार के लिए जाना जाता है।
  • आसपास के क्षेत्र में बाजार के साथ-साथ कई छोटी-बड़ी दुकानें और व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं, जो इस क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं।
  • बाजार के आसपास स्थानीय त्योहारों और मेलों का आयोजन होता रहता है, जो यहाँ की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाते हैं |

8. अतरौलिया का शिव मंदिर(Azamgarh me ghumne ki jagah)

अतरौलिया गाँव में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र है। सावन के महीने में यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ होती है।

कैलेश्वर धाम शिव मंदिर, अतरौलिया

यह मंदिर अतरौलिया सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन शिव मंदिर है | यहाँ की अष्टधातू की मुर्तिया लगभग 400 से 500 वर्ष पुरानी है | यहाँ का शिवलिंग पृथ्वी से अपने आप निकला हुआ यहाँ के लोगो का ऐसा मानना है | सावन के महीने में यहाँ मेला लगता है जहा हजारो श्रद्धालु आते हैं |

पश्चिमी शिव मंदिर, अतरौलिया (मेन रोड, खोखा होटल के पास)

यह अतरौलिया की एक और प्राचीन शिव मूर्ति के लिए जाना जाता है, जो मेन रोड पर स्थित है। स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए यह भी पूजा-अर्चना का एक महत्वपूर्ण स्थान है, हालांकि इसका ऐतिहासिक महत्व कैलेश्वर धाम जितना प्रमुख नहीं है।

  • यह मंदिर लगभग 400 से 500 साल पुराना है और इसे ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मानते है।
  • मंदिर में स्थापित शिवलिंग को यह मान्यता है कि यह पृथ्वी के अंदर से निकला है, जिसे प्राचीन काल में पाताल लोक से प्रकट होने वाला शिवलिंग माना जाता है।
  • यहाँ अष्टधातु (आठ धातुओं) की प्राचीन प्रतिमाएं भी स्थापित हैं, जो मंदिर को विशेष बनाती है।
  • हर साल श्रद्धालु विशेषकर श्रावण मास के पहले सोमवार को यहाँ रुद्राभिषेक और जलाभिषेक के लिए बड़ी संख्या में आते हैं।
  • मंदिर के आसपास समय-समय पर मेलों मेला लगता है, जो धार्मिक उत्सवों और स्थानीय संस्कृति को जीवित रखता है।
  • कहा जाता है कि इस स्थान पर एक ऋषि अपनी गाय चराने आते थे, जहाँ गाय का दूध अचानक गिरना शुरू हो जाता था, जिससे यह स्थान पवित्र माना गया और अंततः यहाँ शिवलिंग की स्थापना हुई |

यात्रा सुझाव: सावन और महाशिवरात्रि पर विशेष आयोजन होते हैं।

9. हरिहरपुर – संगीत की नगरी(Azamgarh me ghumne ki jagah)

यह गाँव भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में एक पहचान रखता है। यहाँ के घराने ने कई महान संगीतज्ञों को जन्म दिया है। संगीत प्रेमियों के लिए यह गाँव किसी तीर्थ से कम नहीं।

यूपी में आजमगढ़ में 600 वर्ष पुरांना शास्त्रीय संगीत का हरिहरपुर घराना संगीत के लिए जिले में ही नहीं, बल्कि पुरे देश से संगीत की ख्याति ले रखी है | यहाँ के लोग बहुत अद्भुत कजरी गाते हैं सावन के महीने में | कजरी के लोकप्रिय धुन के कारन इसे हरिहरपुर घराना शास्त्रीय संगीत के रूप में अपना रखा है |

काफी छोटे उम्र के बच्चे संगीत को अपने विरासत को आगे बढ़ने में जुटे है | घराना के कलाकारों ने गायन, संगीत, तबला-वादन आदि में देश ही नहीं, विश्व में अपनी कला का डंका बजा रखा है। स्वर साधक पद्मविभूषण छुन्नू लाल मिश्रा ने इस घराने को शिखर तक पहुंचाया। 

खास बात: हरिहरपुर घराने की परंपरा आज भी जीवित है।

  • हरिहरपुर घराना का इतिहास लगभग 600 वर्ष पुराना है। इसके संस्थापक आजमगढ़ के निकट रहने वाले पंडित हरिनाम दास और सरिनाम दास थे, जिन्होंने आजमगढ़ के पूर्वज आजम शाह से संगीत के लिए बड़ी भूमि का दान प्राप्त किया था। तब से यह क्षेत्र संगीत की सेवा के लिए समर्पित रहा है |
  • हरिहरपुर में कजरी, दादरा, ठुमरी, चैता, फगुआ जैसे शास्त्रीय और लोक संगीत की विधाओं में महारत हासिल है। यह घराना इन शैलियों को जीवित और लोकप्रिय बनाए रखने के लिए प्रसिद्ध है, खासकर सावन में कजरी सुनने का अपना अलग ही आनंद होता है |
  • हरिहरपुर में लगभग हर परिवार में संगीत की परंपरा चली आ रही है। यहां बच्चों को छोटी उम्र से सारंगी, तबला वादन और गायन की शिक्षा दी जाती है। गांव का पूरा माहौल संगीत की गूँज से भरा रहता है, जिससे इसे संगीत का गुरुकुल भी कहा जाता है |
  • इस घराने के कई कलाकारों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कला का डंका बजाया है। पद्मविभूषण से सम्मानित छन्नू लाल मिश्रा जैसे कलाकार इस घराने के प्रतिनिधि हैं, जिन्होंने ठुमरी और अन्य शास्त्रीय संगीत विधाओं में महारत हासिल की |
  • इंडियन ट्रस्ट फॉर रूरल हेरिटेज एंड डेवलपमेंट ने लगभग एक दशक पहले हरिहरपुर संगीत अकादमी की स्थापना की है, जिससे इस विरासत को पुनर्जीवित करने और नई पीढ़ी को संगीत सिखाने में मदद मिली है। इसके अतिरिक्त, हरिहरपुर कजरी महोत्सव भी हर साल अगस्त माह में धूमधाम से आयोजित किया जाता है |
  • उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर हरिहरपुर घराने की कला-संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए पहल की जा रही है, जिससे इस संगीत घराने की विलुप्तप्राय परंपरा को संरक्षण मिले और कलाकारों को बेहतर मंच मिल सके |

10. आजमगढ़ का स्थानीय भोजन और मिठाइयाँ(Azamgarh me ghumne ki jagah)

अगर घूमने के साथ खाने का भी शौक है, तो आज़मगढ़ आपके लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं। यहाँ की “तुलसी हलवाई की जलेबी”, “गोंद के लड्डू”, और “देशी घी की पूड़ी-सब्जी” ज़रूर ट्राय करें।

खास स्थान: सिविल लाइंस और नरौली के पास कई प्रसिद्ध मिठाई की दुकानें हैं।

निष्कर्ष

“Azamgarh me ghumne ki jagah” की खोज केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक अनुभव है। यहाँ के लोग, यहाँ की भाषा, खाना, हस्तशिल्प, और धार्मिक स्थल – सब मिलकर इसे एक अनोखा पर्यटन स्थल बनाते हैं। अगर आप शांति, संस्कृति और इतिहास को एक साथ जीना चाहते हैं, तो आज़मगढ़ की यात्रा जरूर करें।

FAQ


महर्षि दुर्वासा और गौतम ऋषि के धाम में क्या खास है?

Ans. महर्षि दुर्वासा धाम (आजमगढ़)
Azamgarh me ghumne ki jagah: यह धाम तमसा और मंजूषा नदी के संगम पर स्थित है, जिसे प्राचीन काल से ही अत्यंत पवित्र और तपस्वियों की भूमि माना जाता है। यहाँ महर्षि दुर्वासा ने सतयुग, त्रेतायुग और द्वापर युग में घोर तपस्या की थी और माना जाता है कि उन्होंने 88,000 ऋषियों के साथ यज्ञ और साधना की थी।
गौतम ऋषि धाम
गौतम ऋषि धाम भी आजमगढ़ जिले में स्थित है और पौराणिक महत्व रखता है। यह स्थल ऋषि गौतम की तपोभूमि के रूप में जाना जाता है।
विशेष आकर्षण
दोनों ही धामों में हर वर्ष मेले और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

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