चित्रकूट (Chitrakoot paryatan sthal) एक प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है, जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा है। यह स्थान रामायण काल से जुड़ा हुआ है और भगवान श्रीराम, सीता माता और लक्ष्मण जी के 11 वर्षों के वनवास का प्रमुख स्थल माना जाता है।
- धार्मिक महत्व: चित्रकूट को “अनेक आश्चर्यों की पहाड़ियां” कहा जाता है। यहाँ के मंदिर, घाट, गुफाएँ और पर्वत हिंदू आस्था के केंद्र हैं। यहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु तीर्थयात्रा के लिए आते हैं |
- प्राकृतिक सौंदर्य: यहाँ की पहाड़ियां, शांत नदियाँ (मुख्यतः मंदाकिनी), झरने और हरियाली पर्यटकों को आकर्षित करती हैं |
1. चित्रकूट का इतिहास (Chitrakoot ka Itihaas)(chitrakoot paryatan sthal)

चित्रकूट भारत का एक प्राचीन और पवित्र तीर्थ स्थल है, जो उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले और मध्य प्रदेश के सतना ज़िले में फैला हुआ है। इसका नाम संस्कृत शब्दों “चित्र” और “कूट” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है – “चित्रों से सुसज्जित पर्वत”। यह स्थान धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यहीं पर भरत भगवान राम को अयोध्या लौटाने आए थे। यह प्रसंग भरत मिलाप के नाम से प्रसिद्ध है। चित्रकूट को भगवान राम की तपस्थली और धर्मभूमि कहा जाता है। चित्रकूट में कई ऋषि-मुनियों ने तप किया था, जैसे: अत्रि मुनि और सती अनुसूया, मांडव्य ऋषि, शरभंग ऋषि | यहाँ पर अनेक आश्रम और गुफाएँ हैं जो इन ऋषियों की याद दिलाते हैं।
चित्रकूट गुप्त काल (4वीं–6ठीं सदी) में एक धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र था। यहाँ पर वैदिक शिक्षा, तप और साधना का प्रचार-प्रसार होता था। भारत रत्न नानाजी देशमुख ने चित्रकूट में ग्रामीण विकास के लिए दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की, जो आज भी सक्रिय है।
चित्रकूट का उल्लेख अनेक ग्रंथों में आता है: वाल्मीकि रामायण, तुलसीदास का रामचरितमानस, स्कंद पुराण, और पद्म पुराण | इन ग्रंथों में चित्रकूट को “मोक्षभूमि”, “तपभूमि” और “तीर्थराज” कहा गया है। यहाँ हर साल राम नवमी, दशहरा, और चित्रकूट मेला जैसे पर्वों पर लाखों श्रद्धालु आते हैं।
2. चित्रकूट के प्रमुख धार्मिक और पर्यटक स्थल:(chitrakoot paryatan sthal)
1. कामदगिरि पर्वत (Kamadgiri Parvat)
कामदगिरि पर्वत चित्रकूट का सबसे प्रमुख, प्राचीन और पवित्र तीर्थ स्थल है। संस्कृत में ‘कामदगिरि’ का अर्थ है—ऐसा पर्वत जो सभी इच्छाओं और कामनाओं को पूरा करता है । मान्यता है कि भगवान राम ने यहीं निवास किया था। श्रद्धालु इसकी 5 किमी की परिक्रमा करते हैं, जिससे पापों का नाश होता है और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
- मान्यता है कि कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा करने से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं |
- भगवान श्रीराम ने चित्रकूट छोड़ने से पहले पर्वत को वरदान दिया था कि जो भी श्रद्धा और भक्ति से इसकी परिक्रमा करेगा, उसकी इच्छाएँ पूरी होंगी |
- परिक्रमा की शुरुआत रामघाट में स्नान के बाद होती है, और श्रद्धालु नंगे पैर परिक्रमा करते हैं |
- कामदगिरि पर्वत उत्तर प्रदेश के चित्रकूट और मध्य प्रदेश के सतना जिले की सीमा पर स्थित है |
- पर्वत धनुषाकार (आर्क शेप) में है और वर्षभर हरा-भरा रहता है |
- इसके चारों ओर चार द्वार हैं—उत्तर में कुबेर, दक्षिण में धर्मराज, पूर्व में इंद्र और पश्चिम में वरुण देव द्वारपाल माने जाते हैं
2. राम घाट (Ram Ghat)

यह मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित है। भगवान राम, सीता और लक्ष्मण यहाँ स्नान करते थे। यहाँ की शाम की आरती बहुत प्रसिद्ध और मनमोहक होती है।
- संत गोस्वामी तुलसीदास को भी इसी घाट पर भगवान राम के दर्शन हुए थे |
- राम घाट को चित्रकूट के सबसे प्रमुख घाटों में से एक माना जाता है, जहाँ रामायण काल की कई घटनाएँ घटित हुई थीं |
- यहाँ मंदाकिनी नदी के पवित्र जल में स्नान करने से पापों का नाश और पुण्य की प्राप्ति मानी जाती है |
- घाट पर साधु-संतों द्वारा भजन-कीर्तन, धार्मिक अनुष्ठान और पूजा-पाठ का वातावरण बना रहता है |
- राम घाट पर रंगीन नौकाओं की सवारी का अनुभव लिया जा सकता है |
3. भरतकूप (Bharat Koop)(chitrakoot paryatan sthal)
भरतकूप चित्रकूट के पश्चिम में लगभग 18-20 किलोमीटर दूर स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है, जिसका मुख्य आकर्षण एक विशाल प्राचीन कुआं है। यह स्थान रामायण काल से जुड़ी एक अनूठी कथा और आस्था का केंद्र है। यह एक विशाल कुआँ है जहाँ भरत जी ने राम को अयोध्या लाने से पहले पवित्र तीर्थों का जल एकत्र किया था। धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत पावन स्थान है।
- जब भगवान श्रीराम वनवास में थे, तब उनके भाई भरत उन्हें अयोध्या वापस लाने के लिए चित्रकूट आए थे। भरत जी अपने साथ भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भारत के सभी प्रमुख तीर्थों का पवित्र जल एकत्र कर लाए थे |
- भगवान राम ने राज्याभिषेक स्वीकार नहीं किया, तब ऋषि अत्रि की आज्ञा से भरत ने वह समस्त तीर्थजल इस कुएं में अर्पित कर दिया। तभी से इस कुएं को “भरतकूप” कहा जाता है |
- मान्यता है कि भरतकूप में स्नान करने और इसका जल पीने से सभी तीर्थों के पुण्य की प्राप्ति होती है, और रोगों से मुक्ति मिलती है |
- इस कुएं का जल हर मौसम में विशेष गुणों वाला माना जाता है—गर्मी में ठंडा और सर्दी में गर्म |
- भरतकूप का जल प्रयागराज और हरिद्वार जैसे पुण्यदायी माना जाता है, और यहाँ स्नान, ध्यान, पूजन करने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं
4. सती अनुसूया आश्रम (Sati Anusuya Ashram)

यह स्थान अत्रि मुनि और सती अनुसूया का आश्रम रहा है। मान्यता है कि यहीं त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) बाल रूप में प्रकट हुए थे। यह आश्रम बहुत शांति और आध्यात्मिकता से भरा है। यहाँ माता अनुसूया ने माता सीता को सतीत्व, पतिव्रता धर्म और अखंड सौंदर्य की शिक्षा दी थी।
आश्रम परिसर में भव्य मंदिर, मूर्तियाँ, रामायण से जुड़े दृश्य और संतों की प्रतिमाएँ हैं, जिससे यह श्रद्धालुओं के लिए आस्था और शांति का केंद्र बनता है। सुहागिन महिलाओं के लिए यहाँ सिंदूर चढ़ाने की विशेष परंपरा है, और यहाँ का सिंदूर प्रसाद के रूप में दिया जाता है।
- यह आश्रम चित्रकूट की घने जंगलों और मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित है, जो इसके प्राकृतिक सौंदर्य को और भी बढ़ाता है |
- सती अनुसूया, महर्षि अत्रि की पत्नी थीं। वह अपने पतिव्रत धर्म और तपस्या के लिए प्रसिद्ध थीं। माना जाता है कि इनके तप द्वारा मंदाकिनी नदी का उद्गम हुआ था |
- एक पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, और महेश—तीनों देवता, सती अनुसूया की परीक्षा लेने साधु रूप में आये। माता की शक्ति से वे बालक बन गये |
- यहीं पर माता अनुसूया ने रामायण काल में वनवासी भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता का स्वागत किया था। माता सीता को अनुसूया जी ने पतिव्रता धर्म और गृहस्थ जीवन के गूढ़ उपदेश दिए थे |
- यह आश्रम महर्षि अत्रि, सती अनुसूया और उनके तीन पुत्रों—दत्तात्रेय, दुर्वासा और चंद्रमा का निवास स्थान भी माना जाता है।
- आज भी मंदिर परिसर में पौराणिक रूप से दर्शाती मूर्तियाँ और दृश्य उपस्थित हैं जैसे भगवान कृष्ण और अर्जुन के रथ की बड़ी मूर्ति |
- श्रद्धालु मानते हैं कि यहाँ चढ़ाया गया सिंदूर सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष फलदायी है, और श्रृंगार करने के बाद महिलाओं को प्रसाद के रूप में सिंदूर दिया जाता है।
- परिसर के गरम पानी के कुंड के बारे में मान्यता है कि इसका जल हमेशा गर्म रहता है और यह नदी के उद्गम से जुड़ा है |
- यह स्थल शांति, ध्यान एवं प्रकृति प्रिय लोगों के लिए अत्यंत आकर्षक है; यहाँ विविध वनस्पति, पक्षी और प्राकृतिक पर्वतीय दृश्य मिलते हैं।
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5. हनुमान धारा (Hanuman Dhara)(chitrakoot paryatan sthal)
यह एक पहाड़ी पर स्थित है, जहाँ से एक प्राकृतिक जलधारा बहती है। कहते हैं, हनुमान जी ने यहाँ तप किया और जलधारा से शांति पाई। पहाड़ी पर चढ़ाई थोड़ी कठिन है, लेकिन ऊपर से दृश्य अत्यंत सुंदर है।
- मान्यता है कि लंका दहन के बाद जब हनुमान जी की पूंछ में आग लगी थी, तो वे अपनी जलती पूंछ को शांत करने के लिए यहीं आए थे। भगवान श्रीराम ने अपने बाण से पहाड़ी से जलधारा प्रवाहित की, जिससे हनुमान जी की पूंछ की आग शांत हुई |
- यहाँ हनुमान जी की विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसके ऊपर पहाड़ी से निरंतर जलधारा गिरती रहती है। इस जल को “हनुमान धारा” कहा जाता है |
- ऐसी मान्यता है कि इस जल के दर्शन और स्पर्श से मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और व्यक्ति तनाव मुक्त होता है |
- हनुमान धारा चित्रकूट के कर्वी तहसील से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है |
6. गुप्त गोदावरी (Gupt Godavari)

दो प्राकृतिक गुफाएँ हैं, जिनमें से एक में पानी बहता है। मान्यता है कि भगवान राम और लक्ष्मण यहाँ न्याय करते थे। यह जगह रहस्यमयी और रोमांचक भी लगती है। मध्यप्रदेश के सतना जिले में, चित्रकूट से लगभग 18 किमी दूर विंध्य पर्वत श्रृंखला के पन्ना श्रेणी में स्थित है।
- मान्यता है कि भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के दौरान गुप्त गोदावरी गुफाओं में कुछ समय व्यतीत किया था।
- कथा के अनुसार, गोदावरी नदी का उद्गम महाराष्ट्र के नासिक में हुआ, लेकिन वह चित्रकूट में आकर गुप्त रूप से इन गुफाओं में प्रवाहित होती है और यहीं विलुप्त हो जाती है।
- एक मान्यता यह भी है कि माता गोदावरी अपने पिता की आज्ञा के बिना भगवान राम के दर्शन के लिए चित्रकूट आई थीं, इसलिए यहाँ आकर गुप्त रूप से विलीन हो गईं।
- गुफाओं के भीतर एक जलधारा निरंतर बहती रहती है, जिसे पवित्र और चमत्कारी माना जाता है। श्रद्धालु इस जल में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।
7. स्फटिक शिला (Sphatik Shila)
chitrakoot paryatan sthal यह मंदाकिनी नदी के किनारे एक चमकदार पत्थर है। कहा जाता है कि राम और सीता यहाँ बैठा करते थे। आज भी यहाँ उनके चरण चिह्न दिखाई देते हैं।
- माता सीता ने यहाँ श्रृंगार किया था, और श्रीराम ने इसी शिला पर बैठकर तिनके से धनुष-बाण बनाए थे। इसके चिन्ह आज भी शिला पर देखे जा सकते हैं |
- मान्यता है कि भगवान श्रीराम और माता सीता ने अपने वनवास के दौरान इसी स्फटिक शिला पर विश्राम किया था |
- यहीं पर एक पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं के राजा इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर माता सीता के पैर में चोंच मारी थी। श्रीराम ने तिनकों से धनुष-बाण बनाकर जयंत पर प्रहार किया, जिससे कौवे की एक आंख चली गई। इसी कारण कौवा पक्षी को एक आंख से कम दिखाई देता है |
- स्फटिक शिला को अत्यंत पवित्र और ऊर्जा से भरपूर माना जाता है। यहां बैठकर ध्यान, साधना और आत्मचिंतन करने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है
8. जनकपुरी (Janakpuri)(chitrakoot paryatan sthal)
चित्रकूट से कुछ दूरी पर, इसे माता सीता का मायका कहा जाता है। यहाँ पर भी धार्मिक स्थल और मंदिर स्थित हैं।
- जनकपुरी का शाब्दिक अर्थ है “जनक की नगरी”—यहाँ ‘जनक’ से आशय है माता सीता के पिता राजा जनक, और ‘पुरी’ यानी नगर। आमतौर पर जनकपुरी मिथिला (वर्तमान नेपाल के जनकपुर) को कहा जाता है, जहाँ सीता जी का जन्म हुआ था।
- चित्रकूट में “जनकपुरी” नामक कोई विशिष्ट स्थल या तीर्थ नहीं है, न ही यह चित्रकूट के धार्मिक मानचित्र का हिस्सा है। चित्रकूट मुख्यतः भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के वनवास काल से जुड़े स्थलों के लिए प्रसिद्ध है
9. चित्रकूट टाइगर रिजर्व / देवांगना
प्रकृति प्रेमियों और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर्स के लिए बेहतरीन जगह। यहाँ टाइगर, चीतल, नीलगाय और कई पक्षी देखे जा सकते हैं।
- चित्रकूट में उत्तर प्रदेश का चौथा टाइगर रिजर्व “रानीपुर टाइगर रिजर्व” बनकर तैयार है। यह टाइगर रिजर्व करीब 53,000 हेक्टेयर (530 वर्ग किमी) क्षेत्र में फैला है और नवंबर 2024 से आम जनता के लिए खुल चुका है |
- स्थान: यह टाइगर रिजर्व चित्रकूट धाम मंडल के रानीपुर क्षेत्र में स्थित है और इसका बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के चित्रकूट तथा मध्य प्रदेश के सतना जिले में फैला है |
देवांगना घाटी (Devangana Valley), चित्रकूट
- रामायण काल से जुड़ाव: मान्यता है कि भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के दौरान चित्रकूट के इसी वन क्षेत्र में वर्षों निवास किया था। यहाँ कई पवित्र गुफाएँ हैं, जिनमें श्रीराम के निवास और साधना के चिह्न मिलते हैं |
- पम्पासुर राक्षस की कथा: देवांगना घाटी में पम्पासुर नामक राक्षस का वध हुआ था और यहीं संत रविदास जी की तपस्थली भी है |
- पर्यटन विकास: चित्रकूट हवाई अड्डे के पास देवांगना घाटी में पर्यटक सुविधा केंद्र, डॉर्मिटरी, रेस्टोरेंट, सत्संग हॉल आदि का निर्माण किया जा रहा है, ताकि यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकें |
3.चित्रकूट के प्रमुख मंदिर (Chitrakoot ke Mandir)
चित्रकूट में कई प्रसिद्ध और पावन मंदिर हैं, जो धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ भगवान राम, सीता माता, लक्ष्मण जी, हनुमान जी और अन्य देवताओं से जुड़े अनेक मंदिर स्थित हैं।

1. कामदगिरि मंदिर (Kamadgiri Mandir)
2. हनुमान धारा मंदिर (Hanuman Dhara Mandir)
3. सती अनुसूया मंदिर (Anusuya Mandir)
4. रामदरबार मंदिर (Ram Darbar Mandir)
5. गुप्त गोदावरी मंदिर (Gupt Godavari Mandir)
6. भरत मिलाप मंदिर (Bharat Milap Mandir)
7. स्पटिक शिला मंदिर (Sphatik Shila)
कुछ अन्य मंदिर:
- लक्ष्मण पहाड़ी मंदिर
- जानकी कुंड मंदिर
- मंदाकिनी घाट पर छोटे-छोटे राम-सीता मंदिर
- परिक्रमा मार्ग पर कई छोटे-बड़े मंदिर
4.चित्रकूट में भरत जी की उपस्थिति (Chitrakoot Mein Bharat)
चित्रकूट में भरत जी की भूमिका बहुत ही विशेष और भावनात्मक है। भरत का चरित्र त्याग, भक्ति और भाई के प्रति अगाध प्रेम का प्रतीक माना जाता है। रामायण में वर्णित चित्रकूट का सबसे मार्मिक प्रसंग “भरत मिलाप” यहीं हुआ था।
भरत मिलाप का प्रसंग:
जब अयोध्या लौटे भरत को यह पता चला कि उनकी माता कैकयी की वजह से राम जी को वनवास मिला, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने तुरंत ही राम जी को राजगद्दी लौटाने के लिए चित्रकूट की यात्रा की। उनके साथ माता कौशल्या, सुमित्रा, गुरु वशिष्ठ, जनक आदि भी आए थे।
भरत मिलाप स्थल:
चित्रकूट में वह स्थान जहाँ भरत और राम की भेंट हुई थी, उसे “भरत मिलाप मंदिर” कहा जाता है। यह स्थान कामदगिरि पर्वत के पास स्थित है। यहाँ एक पवित्र शिला (पत्थर) है जहाँ माना जाता है कि दोनों भाइयों ने एक-दूसरे को गले लगाया था।
भरत कूप (Bharat Koop):
जब भरत राम को वापस लाने चित्रकूट आए, तो उन्होंने रास्ते में सभी तीर्थों का जल इकट्ठा किया। उस जल को एक विशाल कुएं में रखा गया, जिसे भरत कूप कहते हैं।
भरत का आदर्श चरित्र:
भरत ने राम जी की आज्ञा से अयोध्या की राजगद्दी पर बैठने से इनकार कर दिया। उन्होंने राम जी की खड़ाऊँ (चप्पल) को सिंहासन पर रखकर 14 वर्षों तक राज्य चलाया, खुद एक वनवासी की तरह रहे। यह त्याग और भक्ति उन्हें “मर्यादा और आदर्श भाई” का प्रतीक बनाता है।
5.चित्रकूट के बजट होटल (Budget Hotels in Chitrakoot)
| होटल का नाम | स्थान | अनुमानित कीमत (₹/रात) | सुविधाएँ |
|---|---|---|---|
| Hotel Nirmal | जंकी कुंड, चित्रकूट | ₹999 | 24 घंटे रूम सर्विस, फ्री कैंसलेशन |
| Hotel Mandakini The Heritage | जंकी कुंड, चित्रकूट | ₹1,808 | रेस्तरां, 24 घंटे रूम सर्विस |
| Hotel Yatrika | जंकी कुंड, चित्रकूट | ₹1,300 | रेस्तरां, बोनफायर, फायरप्लेस |
| Hotel Raj | कामतानाथ मंदिर के पास | ₹2,378 | रेस्तरां, रूम सर्विस |
| Hotel Kesar | जंकी कुंड, चित्रकूट | ₹1,799 | रेस्तरां, 24 घंटे रूम सर्विस |
| Hotel Chitrakoot Darshan | राम कुटी आश्रम के सामने | ₹1,999 | नजदीकी मंदिरों के पास |
6.चित्रकूट के बजट भोजनालय (Budget Restaurants in Chitrakoot)
| भोजनालय का नाम | स्थान | अनुमानित कीमत (₹) | विशेषता |
|---|---|---|---|
| शंकर भोजनालय | चित्रकूट मुख्य मार्ग | ₹70–₹120 | शाकाहारी थाली, स्थानीय स्वाद |
| संत का भोजनालय | चित्रकूट मुख्य मार्ग | ₹100–₹150 | सात्विक भोजन, शुद्ध सामग्री |
| काजू दाल मखानी | चित्रकूट मुख्य मार्ग | ₹150–₹200 | दाल मखानी, तंदूरी रोटियां |
| बाबा जी का सात्विक भोजनालय | चित्रकूट मुख्य मार्ग | ₹120–₹180 | आलू बैगन का भर्ता, बाजरे की रोटी |
7.चित्रकूट का पारंपरिक भोजन (Traditional Food of Chitrakoot):
चित्रकूट का भोजन (Chitrakoot Ka Bhojan) बहुत ही सरल, सात्विक और पारंपरिक भारतीय स्वाद से भरपूर होता है। यहाँ का खाना मुख्यतः शाकाहारी होता है, क्योंकि यह एक धार्मिक स्थल है। भोजन में उत्तर भारत की झलक साफ दिखाई देती है – रोटी, दाल, चावल, सब्ज़ी और देसी घी का प्रयोग आम है।
| व्यंजन का नाम | विवरण |
|---|---|
| पूड़ी-सब्ज़ी | त्योहारों और मंदिरों में सबसे ज़्यादा मिलने वाला भोजन। |
| कढ़ी-चावल | हल्का और स्वादिष्ट भोजन, दोपहर में आम तौर पर खाया जाता है। |
| दाल-चावल-रोटी-सब्ज़ी | रोज़ाना का सामान्य सात्विक भोजन। |
| खिचड़ी | उपवास या हल्के भोजन के रूप में पसंद किया जाता है। |
| मक्खन व मिस्सी रोटी | देसी स्वाद से भरपूर, खासकर सर्दियों में। |
| पराठा और अचार | सुबह के नाश्ते में प्रचलित। |
8. मिठाइयाँ और खास व्यंजन:
| मिठाई/व्यंजन | विशेषता |
|---|---|
| लड्डू | मंदिरों में प्रसाद के रूप में मिलता है। |
| हलवा | विशेष रूप से धार्मिक अवसरों पर बनाया जाता है। |
| पेड़ा | स्थानीय दुकानों पर आसानी से उपलब्ध। |
| सातू का शरबत/लड्डू | गर्मियों में सेहतमंद और स्वादिष्ट। |
| चना-चबेना | यात्रा के दौरान हल्का नाश्ता। |
9.सात्विक भोजनालयों और आश्रमों में भोजन:
चित्रकूट में कई आश्रम और धार्मिक भोजनालय (लंगर/भंडारा) हैं जहाँ:
- chitrakoot paryatan sthal नि:शुल्क या कम कीमत पर शुद्ध शाकाहारी भोजन उपलब्ध होता है।
- बिना प्याज़ और लहसुन वाला सात्विक खाना परोसा जाता है।
- यात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था सादा लेकिन प्रेमपूर्वक की जाती है।
10.चित्रकूट धाम का महत्व (chitrakoot paryatan sthal)
चित्रकूट धाम एक पवित्र धार्मिक स्थल है, जिसे “तीर्थराज” यानी तीर्थों का राजा भी कहा जाता है। यह उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ज़िले और मध्य प्रदेश के सतना ज़िले की सीमा पर स्थित है। चित्रकूट का ऐतिहासिक, धार्मिक और प्राकृतिक महत्त्व इतना अधिक है कि यह सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का केंद्र है। इस स्थान का वर्णन वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, और अन्य पुराणों में भी मिलता है।
चित्रकूट धाम के प्रमुख धार्मिक स्थल:
| स्थल का नाम | विवरण |
|---|---|
| कामदगिरि पर्वत | भगवान राम का निवास स्थल, यहाँ की परिक्रमा अत्यंत पुण्यदायी मानी जाती है। |
| राम घाट | मंदाकिनी नदी के किनारे स्थित, यहाँ श्रीराम स्नान करते थे। |
| हनुमान धारा | जलधारा जहां हनुमान जी ने तपस्या की थी। |
| गुप्त गोदावरी | दो गुफाएं, जहाँ राम और लक्ष्मण ने राज्य संचालन किया था। |
| भरत कूप | भरत द्वारा लाए गए तीर्थों के जल को समर्पित कुआँ। |
| सती अनुसूया आश्रम | अनुसूया माता और अत्रि मुनि का पावन स्थल। |
| स्फटिक शिला | मंदाकिनी तट पर स्थित वह पत्थर जहाँ राम-सीता बैठते थे। |
धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियाँ:
- रामघाट पर संध्या आरती
- कामदगिरि की परिक्रमा (5 किमी)
- भंडारा सेवा और कथा प्रवचन
- पर्वों पर विशाल मेले (राम नवमी, माघ मेला)
11.चित्रकूट के प्रसिद्ध झरने (Chitrakoot Waterfalls)
चित्रकूट धार्मिक स्थलों के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है, और यहाँ के कुछ झरने (Waterfalls) पर्यटकों को बहुत आकर्षित करते हैं। हालाँकि चित्रकूट में झरनों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, लेकिन जो भी हैं, वे आध्यात्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से काफी खास हैं।
1. हनुमान धारा (Hanuman Dhara Waterfall)

चित्रकूट का सबसे प्रसिद्ध झरना। यह एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जहाँ एक चट्टान से ठंडा जल गिरता है। मान्यता है कि लंका दहन के बाद हनुमान जी ने यहाँ तपस्या की थी, और यह जलधारा उन्हें ठंडक देने के लिए प्रकट हुई। यहाँ तक पहुँचने के लिए लगभग 360 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
2. गुप्त गोदावरी जलधारा (Gupt Godavari Stream)
यह एक प्राकृतिक जलधारा है जो गुफा के भीतर से बहती है। पानी घुटनों तक रहता है, और गुफा में चलना एक अलग ही एहसास देता है।
3. सती अनुसूया जलधारा (Sati Anusuya Waterfall)
यह झरना सती अनुसूया आश्रम के पास स्थित है। मानसून के समय यहाँ एक छोटा सुंदर झरना बहता है, जो हरे-भरे जंगलों के बीच से आता है। बहुत ही शांत और ध्यान के लिए उपयुक्त स्थान।
12.चित्रकूट घूमने का सर्वोत्तम समय:
अक्टूबर से मार्च (शरद और शीत ऋतु) | तापमान: 10°C से 25°C के बीच | इस समय पर्यटक और श्रद्धालु बिना गर्मी की परेशानी के सभी स्थलों का भ्रमण कर सकते हैं।
त्योहारों और मेलों का समय:
| पर्व/मेला | समय | विशेषता |
|---|
| राम नवमी | मार्च/अप्रैल | राम जन्मोत्सव, बड़ा मेला, भक्ति माहौल |
| माघ मेला | जनवरी/फरवरी | मंदाकिनी तट पर मेला, स्नान, कथा |
| दशहरा | सितंबर/अक्टूबर | राम लीला, झांकियाँ, विशेष पूजा |
| दीपावली | अक्टूबर/नवंबर | राम का अयोध्या लौटना, दीप सज्जा |
| श्रावण मास | जुलाई/अगस्त | हनुमान धारा, शिव मंदिरों में भीड़ |
13. चित्रकूट घूमने की आदर्श अवधि: 2 से 3 दिन
14. चित्रकूट एयरपोर्ट (Chitrakoot Airport)
चित्रकूट इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Chitrakoot International Airport) | यह एयरपोर्ट उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले में स्थित है। मुख्य शहर करवी से लगभग 20–25 किमी की दूरी पर स्थित है।
मुख्य शहर करवी से लगभग 20–25 किमी की दूरी पर स्थित है।
| माध्यम | दूरी | समय |
|---|---|---|
| टैक्सी/कैब | ~25 किमी | 30–40 मिनट |
| ऑटो रिक्शा | उपलब्ध | कम दूरी के लिए |
नजदीकी बड़े एयरपोर्ट (यदि चित्रकूट एयरपोर्ट से सेवा न मिले):
| एयरपोर्ट | दूरी (किमी में) | शहर |
|---|---|---|
| प्रयागराज एयरपोर्ट | लगभग 115 किमी | प्रयागराज |
| खजुराहो एयरपोर्ट | लगभग 180 किमी | मध्य प्रदेश |
| वाराणसी एयरपोर्ट | लगभग 270 किमी | वाराणसी |
चित्रकूट के कामदगिरी का क्या इतिहास है?
चित्रकूट के कामदगिरी का इतिहास और महत्व निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
पौराणिक उत्पत्ति
कामदगिरी का नामकरण भगवान राम द्वारा किया गया, जिन्होंने वनवास के दौरान यहाँ 11 वर्ष 7 माह बिताए। जब राम यहाँ से जाने लगे, तो पर्वत ने उनसे वरदान माँगा कि उनके जाने के बाद भी लोग इसे याद रखें। इस पर राम ने इसे “कामदगिरी” (मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाला) नाम दिया
दिव्य संरचना
चार द्वार एवं द्वारपाल:
उत्तर: कुबेर
दक्षिण: धर्मराज
पूर्व: इंद्र
पश्चिम: वरुण
